
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के तेलियाजोत गांव से आने वाले हरीश द्विवेदी का राजनीतिक सफर छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से शुरू हुआ। वर्ष 1991 में उन्होंने संगठन के साथ सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया और अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं। यही अनुभव आगे चलकर उनके बीजेपी संगठन में लंबे सफर की नींव बना।
शिक्षा और शुरुआती जीवन
हरीश द्विवेदी का जन्म 22 अक्टूबर 1971 को हुआ था। उनके पिता का नाम साधु शरण दुबे और माता का नाम यशोदा देवी है। उन्होंने दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए की पढ़ाई की। वर्ष 2006 में उनका विवाह विनीता द्विवेदी से हुआ। उनके एक बेटा और एक बेटी हैं।
दो बार बस्ती से सांसद बने
वर्ष 2012 में हरीश द्विवेदी ने बस्ती सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें बस्ती से मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार संसद में प्रवेश किया।
2019 में उन्होंने एक बार फिर बस्ती लोकसभा सीट से चुनाव जीता और लगातार दूसरी बार सांसद बने। संसद में रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण समितियों में भी काम किया।

संगठन में निभाईं कई अहम जिम्मेदारियां
हरीश द्विवेदी बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने बिहार बीजेपी के सह-प्रभारी और प्रभारी के तौर पर भी संगठनात्मक जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2024 से वह असम में बीजेपी के प्रभारी की भूमिका निभा रहे हैं। असम में संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर पार्टी की गतिविधियों को बढ़ाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
संसदीय समितियों में भी अनुभव
पूर्व सांसद के तौर पर द्विवेदी ने कोयला मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में काम किया। वह सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समितियों में भी जिम्मेदारी निभा चुके हैं। इन अनुभवों ने उन्हें संगठन के साथ-साथ नीतिगत और संसदीय मामलों की समझ भी दी।
अब राष्ट्रीय संगठन में बड़ी भूमिका
बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी मिलना हरीश द्विवेदी के राजनीतिक सफर का बड़ा पड़ाव माना जा रहा है। छात्र राजनीति से शुरू हुई यात्रा अब पार्टी के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे तक पहुंच चुकी है। नई जिम्मेदारी के साथ उनके सामने संगठन को मजबूत करने, राज्यों में समन्वय बढ़ाने और पार्टी की रणनीति को जमीन तक पहुंचाने की बड़ी चुनौती होगी।
