
सीतापुर में कांग्रेस को अपना पुराना कार्यालय खाली करना पड़ सकता है। नगर पालिका के बेदखली आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कांग्रेस को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि सरकारी जमीन पर लंबे समय तक कब्जा रहने से वह कानूनी अधिकार में नहीं बदल जाता।
हाई कोर्ट ने स्टे देने से किया इनकार
कांग्रेस नगर अध्यक्ष की ओर से नगर पालिका परिषद सीतापुर के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिका में कार्यालय खाली कराने के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी संपत्ति पर कब्जे को वैध साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज होने चाहिए।
1971 से चल रहा था कांग्रेस कार्यालय
यह मामला सीतापुर शहर के घंटाघर इलाके में स्थित कांग्रेस कार्यालय से जुड़ा है। कांग्रेस का दावा है कि यह कार्यालय वर्ष 1971 से संचालित हो रहा है।
कांग्रेस ने अदालत में 320 रुपये किराया जमा करने की पुरानी रसीद भी पेश की, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इसके बाद लंबे समय तक कोई किराया जमा नहीं किया गया।

नजूल जमीन पर कब्जे का आरोप
नगर पालिका और राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि जिस जमीन पर कांग्रेस कार्यालय बना है, वह नजूल संपत्ति है।
सरकार का दावा था कि कांग्रेस के पास इस जमीन के आवंटन से जुड़ा कोई वैध दस्तावेज नहीं है। वहीं, कांग्रेस ऐसा कोई अलॉटमेंट लेटर या समझौता पेश नहीं कर सकी जिससे कानूनी अधिकार साबित हो सके।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी सरकारी जमीन पर वर्षों तक कब्जा बनाए रखने से कब्जा स्वतः कानूनी नहीं हो जाता।
अदालत ने कहा कि जमीन पर अधिकार साबित करने के लिए वैध आवंटन आदेश या अन्य कानूनी दस्तावेज जरूरी हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने स्टे याचिका खारिज कर दी।
नगर पालिका ने जारी किया था नोटिस
इस पूरे मामले की शुरुआत नगर पालिका परिषद सीतापुर के नोटिस से हुई थी। प्रभारी ईओ सीमा सिंह ने कांग्रेस शहर कार्यालय को खाली करने का निर्देश दिया था।
कांग्रेस ने जवाब में दावा किया था कि कार्यालय को पुरानी व्यवस्था के तहत जगह दी गई थी, लेकिन नगर पालिका रिकॉर्ड में इसका कोई प्रमाण नहीं मिला।
सीतापुर कांग्रेस कार्यालय विवाद अब कानूनी लड़ाई से आगे बढ़कर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। हाई कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस के सामने अब कार्यालय बचाने की चुनौती है। यह मामला एक बार फिर सरकारी जमीनों पर लंबे समय से चले आ रहे कब्जों और उनके कानूनी अधिकारों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
