
कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार के निधन के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। दिल्ली सरकार के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि पार्टी ने लंबे समय तक कुमार को राजनीतिक संरक्षण दिया।
सज्जन कुमार के निधन के बाद सियासत तेज
1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार, 20 अगस्त को निधन हो गया। उनके निधन के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर हमला तेज कर दिया।
दिल्ली सरकार में मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार को बचाने की कोशिश करती रही। उन्होंने कांग्रेस पर सिख विरोधी मानसिकता रखने का आरोप भी लगाया।
सिरसा ने लगाए गंभीर आरोप
सिरसा ने कहा कि कांग्रेस सज्जन कुमार को अपना आदर्श बताती रही, जबकि उनके खिलाफ 1984 दंगों से जुड़े गंभीर मामले सामने आए थे। उन्होंने गांधी परिवार पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सिखों के प्रति पार्टी की सोच में बदलाव नहीं आया है।
उन्होंने 1984 की हिंसा को याद करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि “जब बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती है।”
1984 के मामलों में दोषी ठहराए गए थे
सज्जन कुमार के खिलाफ 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े कई मामले चले। कुछ मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया, जबकि कुछ में वह बरी भी हुए।

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। राज नगर इलाके में पांच सिखों की हत्या के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिसंबर 2018 में सज्जन कुमार को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
दूसरे हत्या मामले में भी मिली सजा
सज्जन कुमार को सरस्वती विहार में जसवंत सिंह और तारनदीप सिंह की हत्या से जुड़े मामले में भी दोषी ठहराया गया था।
फरवरी 2025 में हाई कोर्ट ने इस मामले में उनकी भूमिका को लेकर गंभीर निष्कर्ष दिए और माना कि वह भीड़ को उकसाने में शामिल थे। इस मामले में भी उन्हें उम्रकैद की सजा मिली।
पंजाब चुनाव से पहले मुद्दा गरम
सज्जन कुमार के निधन के समय पंजाब की राजनीति भी धीरे-धीरे चुनावी रंग में आ रही है। विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और बीजेपी अपनी राजनीतिक तैयारियों को धार दे रहे हैं।
ऐसे में 1984 का मुद्दा बीजेपी के लिए कांग्रेस पर हमला करने का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार बन सकता है। खासकर पंजाब में सिख मतदाताओं के बीच यह मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है।
1984 की विरासत पर फिर सवाल
सज्जन कुमार की मौत के साथ उनके खिलाफ चले कानूनी मामलों का एक अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन 1984 की हिंसा की राजनीतिक विरासत अब भी कायम है। सिरसा के बयान ने इसी पुराने घाव को फिर राजनीतिक बहस के सामने ला दिया है।
आने वाले पंजाब चुनाव में 1984 का इतिहास कितना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा, यह समय बताएगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस घटना की याद और उससे जुड़े न्याय के सवाल आज भी पंजाब की राजनीति में गहरी संवेदनशीलता रखते हैं।
