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पंजाब की सियासत: भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का खेल बिगाड़ सकते हैं छोटे दल

भाजपा और अकाली दल में समझौते की चर्चाओं के बीच भाजपा की अकेले दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी

Punjab Assembly Election: पंजाब में अभी आम आदमी पार्टी की सरकार है। यह गैर एनडीए शासित राज्य है। यहां पर अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं। इसके लिए भाजपा जहां व्यूहरचना बना रही है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस वापसी करना चाहती है। जबकि आम आदमी पार्टी फिर से जीतकर अपनी पकड़ साबित करना चाहती है लेकिन इस सब के बीच शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी के बीच अलायंस टूट गया है। मायावती ने अकेले लड़ने का फैसला किया है। यह पहला मौका नहीं है जब SAD और BSP का ब्रेकअप हुआ है।

गौरतलब हो कि बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था। सियासी हलकों में चर्चा है कि मायावती ने यह फैसला पंजाब के सीनियर नेताओं के साथ बैठक में रिव्यू के बाद लिया है। अगर शिरोमणि अकाली दल का बीजेपी से भी गठबंधन नहीं होता है तो ऐसी स्थिति में चतुष्कोणीय लड़ाई के बीच बीएसपी और अमृतपाल की पार्टी भी बड़े दलों का खेल बिगाड़ेंगी।

पंजाब के पूर्व डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल और पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद से राज्य में एक बार फिर से बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के साथ आने की चर्चा हो रही है, लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी एल संतोष और प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों कह चुके हैं कि बीजेपी अकेले लड़ेगी। पंजाब के नए प्रभारी बनाए गए सतीश पूनिया ने भी यही दावा किया है। पुनिया ने कहा कि बीजेपी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। आपको यह सुनने में बोरिंग लगेगा लेकिन मैं इस दोहरा रहा हूं। पूनिया ने सुखबीर सिंह बादल और पीएम मोदी की मुलाकात पर कहा कि मुलाकात का मतलब गठबंधन नहीं है।

पंजाब की सियासत: भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का खेल बिगाड़ सकते हैं छोटे दल

पूनिया का यह बयान 2027 के पंजाब असेंबली इलेक्शन से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच सुलह की अटकलों के बीच आया है। राज्यसभा सदस्य सतीश पूनिया ने कहा कि पीएम मोदी डेमोक्रेटिक हेड हैं। उनसे मिलने की कई वजहें हो सकती हैं। पूनिया ने खुद को केंद्र का राजदूत बताया। गौरतलब हो कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के छह राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने के बाद बीजेपी विशेष तौर पर मिशन पंजाब पर फोकस कर रही है।

एनडीए सरकार से जुड़े केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के समझौते को समय की जरूरत बताकर इसमें नई चर्चा शुरू कर दी है।

बता दें कि पिछले तीन दशक में भाजपा ने पंजाब में सभी सीटों पर कभी चुनाव नहीं लड़ा है। तीन दशक की राजनीति की बात की जाए तो भाजपा ने कभी अकेले भी चुनाव नहीं लड़ा है। 1997 में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच समझौता हुआ था यह समझौता 2017 के चुनाव तक लगातार जारी रहा। इस समझौते में भाजपा 23 और शिरोमणि अकाली दल 94 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारते रहे। 2007 में भाजपा के 19 विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचे यह सबसे बड़ी संख्या थी। 2012 में उसके 12 विधायक बने। 2002 और 2017 में भाजपा के तीन-तीन उम्मीदवार जीतकर विधानसभा में पहुंचे। 2022 का चुनाव भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की पीएलसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। पहली बार भाजपा बड़े सहयोगी के रूप में गठबंधन में शामिल हुई। भाजपा ने 73 सीटों पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतरे लेकिन इनमें से केवल दो जीतकर विधानसभा पहुंचे।

पंजाब में बीजेपी-शिरोमणि अकाली दल का पारंपरिक 23-94 का फॉर्मूला रहा है। सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चाएं राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही हैं। भाजपा के सभी नेता अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं। राजनीति के जानकार लोग मानते हैं कि जब तक गठबंधन पर अंतिम मोहर नहीं लगेगी तब तक भाजपा सार्वजनिक रूप से अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कहती रहेगी।

सूत्र बताते हैं कि शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा के समझौते में वर्तमान में कई अड़चनें सामने आ रही हैं। भाजपा अकाली दल के साथ अब छोटे पार्टनर के रूप में नहीं बल्कि बड़े सहयोगी दल के रूप में शामिल होने की इच्छुक है। दूसरी बात भाजपा सुखबीर बादल को सीधे तौर पर अगले मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत करने को भी तैयार नहीं है। माना जा रहा है कि अगर समझौता होता भी है तो पार्टी आधी सीटों पर चुनाव लड़ेगी और मुख्यमंत्री का फैसला चुनाव के बाद करने की बात कही जा सकती है। इस बात पर से की हो सकती है कि अगर गठबंधन सत्ता में आता है तो जिस दल की सीट ज्यादा होंगी, उसी दल से मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

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