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संसद में भगवा प्रदर्शन पर बढ़ी सियासी बहस, पप्पू यादव के समर्थन में बोले कीर्ति आजाद

राम मंदिर चढ़ावा चोरी के कथित मामले को लेकर संसद परिसर में निर्दलीय सांसद पप्पू यादव का भगवा वस्त्र पहनकर किया गया प्रदर्शन अब राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गया है। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद ने प्रतिक्रिया देते हुए पप्पू यादव का बचाव किया और सरकार पर भी निशाना साधा। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम ने संसद से लेकर सियासी गलियारों तक नई चर्चा छेड़ दी है।

कीर्ति आजाद ने क्या कहा?

पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के संसद परिसर में भगवा वस्त्र पहनकर प्रदर्शन करने पर टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि पप्पू यादव ने यह दिखाने की कोशिश की है कि कथित तौर पर “डकैती किस तरह हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी नित्यानंद दास, गोविंद देव गिरि और दिनेंद्र दास जैसे कई भगवाधारी लोग भी ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं।

संसद में भगवा प्रदर्शन पर बढ़ी सियासी बहस, पप्पू यादव के समर्थन में बोले कीर्ति आजाद

सरकार पर साधा निशाना

कीर्ति आजाद ने अपने बयान में सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि धार्मिक संस्थानों का सम्मान बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि कुछ राजनीतिक नेताओं के बयान और गतिविधियां संस्थाओं की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है।

भगवा पहनने को लेकर पहले भी हुआ था विवाद

संसद में भगवा वस्त्र पहनने के बाद वाराणसी में पप्पू यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पप्पू यादव ने कहा था कि वह किसी भी कानूनी कार्रवाई से डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अन्य लोगों को भगवा पहनने का अधिकार है तो उन्हें भगवा धारण कर अपनी बात रखने से क्यों रोका जा रहा है। उनके बयान ने इस विवाद को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी हुआ हंगामा

संसद में प्रदर्शन के बाद पप्पू यादव ने 2 अगस्त को अपने सरकारी आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसी दौरान कथित तौर पर एक युवक ने उन पर चप्पल फेंक दी, जिससे वहां कुछ देर के लिए हंगामे की स्थिति बन गई। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित किया।

विवाद के केंद्र में राजनीति और प्रतीक

पप्पू यादव का भगवा वस्त्र पहनकर किया गया प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने धार्मिक प्रतीकों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक संदेशों पर भी बहस छेड़ दी है। अब इस पूरे मामले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं और कानूनी प्रक्रियाएं आने वाले दिनों में इस विवाद की दिशा तय करेंगी।

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