
अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले तंज ने उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति में पुरानी बहस फिर छेड़ दी है। सवाल सिर्फ जयंत चौधरी या जाट समाज की नाराजगी का नहीं, बल्कि यह भी है कि सपा के साथ आने वाले दलों की चुनावी ताकत वास्तव में कितनी बढ़ी?
2024 में सपा गठबंधन का सबसे मजबूत प्रदर्शन
2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं। यह पिछले दो लोकसभा चुनावों के मुकाबले बड़ा उछाल था। इसी गठबंधन में कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीतीं।
2019 में कांग्रेस को यूपी में केवल रायबरेली सीट मिली थी। अमेठी में राहुल गांधी की हार हुई थी। ऐसे में सपा के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार साफ दिखाई देता है।
बसपा को भी मिला था बड़ा फायदा
2019 में सपा और बसपा करीब ढाई दशक बाद एक साथ आए थे। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं, जबकि सपा के खाते में केवल 5 सीटें आईं।
खास बात यह थी कि 2014 में बसपा यूपी में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी थी। यानी गठबंधन के बाद बसपा ने अपना खाता मजबूती से खोला। हालांकि चुनाव के बाद दोनों दलों का साथ ज्यादा समय नहीं चला।

जयंत चौधरी की पार्टी का भी बढ़ा आंकड़ा
2022 विधानसभा चुनाव में रालोद ने सपा के साथ गठबंधन किया। जयंत चौधरी की पार्टी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर 8 सीटें जीतीं। इससे पहले 2017 में रालोद सिर्फ एक सीट जीत सकी थी।
यही आंकड़ा अखिलेश के बयान को राजनीतिक आधार देता है। हालांकि बाद में रालोद ने सपा से दूरी बनाकर भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया।
छोटे दलों की तस्वीर मिली-जुली
सुभासपा ने 2022 में 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीतीं। यह 2017 के उसके 4 विधायकों के मुकाबले सुधार था। अपना दल (कमेरावादी) को भी गठबंधन में एक सीट मिली, जहां पल्लवी पटेल ने केशव प्रसाद मौर्य को हराया।
लेकिन हर सहयोगी की कहानी सफल नहीं रही। महान दल को आठ सीटें मिलीं, मगर उसके सभी उम्मीदवार हार गए। जनवादी पार्टी भी बिंदकी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी।
2017 में कांग्रेस को नहीं मिला फायदा
2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 7 सीटें जीत सकी। 2012 में उसके 28 विधायक थे। यानी पिछले प्रदर्शन की तुलना में उसे बड़ा नुकसान हुआ।
इसलिए ‘गठबंधन में शामिल हर दल को फायदा हुआ’ कहना आंकड़ों के लिहाज से सही नहीं होगा। सहयोगियों की सफलता सीटों, क्षेत्रीय प्रभाव और उम्मीदवारों पर भी निर्भर रही।
आंकड़े क्या कहते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार समीरात्मज मिश्र के मुताबिक, पिछले तीन बड़े चुनावों—2019, 2022 और 2024—में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई प्रमुख दलों को चुनावी फायदा हुआ। सपा प्रवक्ता मनोज काका भी इन्हीं आंकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि पार्टी ने सहयोगियों को आगे बढ़ने का अवसर दिया।
दूसरी तरफ, मायावती ने अखिलेश के बयान को अमर्यादित बताते हुए माफी की मांग की है। जयंत समर्थकों की नाराजगी ने विवाद को और राजनीतिक रंग दे दिया है।
