पेड़ों की कटाई पर MP हाईकोर्ट का अनोखा फैसला, जनहित याचिकाकर्ताओं को लगाने होंगे 25-25 फलदार पेड़

सड़कों और हाईवे निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई पर दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसा निर्देश दिया, जिसने पर्यावरण संरक्षण की बहस को नई दिशा दी है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को ही पेड़ लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी।
पेड़ों की कटाई पर उठे थे सवाल
मध्य प्रदेश में सड़क चौड़ीकरण और नए हाईवे निर्माण के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर आनंद और विवेक कुमार शर्मा ने हाईकोर्ट का रुख किया था। याचिका में कहा गया कि विकास कार्यों के लिए बड़ी संख्या में हरे पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन उसी अनुपात में नए पौधे नहीं लगाए जा रहे।
याचिकाकर्ताओं ने पर्यावरण संतुलन बनाए रखने और कथित अवैध कटाई पर रोक लगाने की मांग की थी।
2015 के नोटिफिकेशन को दी गई थी चुनौती
याचिका में राज्य सरकार के 24 सितंबर 2015 के एक नोटिफिकेशन को भी चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इससे निर्माण कार्यों के लिए पेड़ों की कटाई का रास्ता आसान हुआ और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ा।
हाईकोर्ट की फुल बेंच इस विवादित नोटिफिकेशन को पहले ही रद्द कर चुकी है। मौजूदा सुनवाई में अदालत ने इसी पृष्ठभूमि में आगे की स्थिति पर विचार किया।

आंकड़ों की कमी पर अदालत ने जताई चिंता
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने कहा कि 2019 में याचिका दाखिल होने के बाद कई हाईवे बन चुके हैं और सड़कें चौड़ी की जा चुकी हैं।
हालांकि, अदालत के सामने ऐसा स्पष्ट और प्रमाणित डेटा उपलब्ध नहीं था कि इस दौरान कितने पेड़ काटे गए और उनके बदले कितने पौधे लगाए गए। पीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता इस मुद्दे को आगे उठाना चाहते हैं तो वे ठोस आंकड़ों के साथ फिर अदालत आ सकते हैं।
अब याचिकाकर्ता लगाएंगे 25-25 फलदार पेड़
मामले का सबसे खास पहलू अदालत का पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा निर्देश रहा। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्रों में नगर निगम द्वारा चिन्हित स्थानों पर 25-25 फलदार पेड़ लगाने का आदेश दिया है।
सिर्फ पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं होगा। याचिकाकर्ताओं को रोपण के बाद इसकी रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष पेश करनी होगी।
जनहित से व्यक्तिगत जिम्मेदारी तक
अदालत का यह निर्देश सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक व्यावहारिक संदेश भी देता है। जनहित में पेड़ों की कटाई का मुद्दा उठाने वालों को अब खुद हरियाली बढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फुल बेंच के फैसले को लागू किया जाना चाहिए।
विकास के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी
सड़कें और हाईवे विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन उनकी कीमत प्रकृति से नहीं चुकाई जा सकती। हाईकोर्ट का आदेश इसी संतुलन की ओर संकेत करता है।
अगर विकास की राह में पेड़ कटते हैं, तो उनकी भरपाई सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। यही इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश है।
