दलबदल पर स्पीकर की ताकत कितनी बड़ी?

राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब किसी पार्टी के विधायक टूटकर नया गुट बनाते हैं तो असली परीक्षा विधानसभा अध्यक्ष यानी स्पीकर की शुरू होती है। कई बार एक फैसला सरकार बचा सकता है और एक फैसला सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।
क्यों अहम हो जाते हैं स्पीकर?
जब किसी राजनीतिक दल में टूट या बगावत होती है, तब यह तय करना जरूरी हो जाता है कि नया गुट वैध है या नहीं। ऐसे मामलों में स्पीकर की भूमिका निर्णायक बन जाती है। उनके फैसले से न केवल विधायकों का भविष्य तय होता है, बल्कि सरकार की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
दलबदल कानून क्या कहता है?
संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, इस प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। नियमों के अनुसार यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक अलग होकर नया गुट बनाते हैं, तो उन्हें दलबदलू नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में स्पीकर उस गुट को मान्यता दे सकते हैं।
यही प्रावधान कई बार बड़े राजनीतिक बदलावों की वजह बनता है।
कब जा सकती है सदस्यता?
यदि बागी विधायकों की संख्या दो-तिहाई से कम रहती है, तो मामला गंभीर हो जाता है। मूल पार्टी की शिकायत पर स्पीकर उन विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकते हैं। इस दौरान स्पीकर एक अर्ध-न्यायिक संस्था की तरह काम करते हैं और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला देते हैं।
नए गुट को मिलने वाले अधिकार
मान्यता मिलने के बाद नया गुट सदन में अलग पहचान हासिल कर लेता है। उसके लिए अलग बैठने की व्यवस्था की जाती है और उसके नेता को विधायी दल के नेता के रूप में मान्यता मिलती है। सदन की बहस, प्रश्नकाल और अन्य कार्यवाहियों में भी उसे संख्या बल के आधार पर समय मिलता है।
व्हिप विवाद में भी अंतिम भूमिका
कई बार मूल पार्टी और बागी गुट दोनों अपने-अपने व्हिप जारी करते हैं। ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर यह तय करने की जिम्मेदारी भी स्पीकर की होती है कि सदन की कार्यवाही में किस व्हिप को मान्यता दी जाएगी।
