
बिहार विधान परिषद चुनाव ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। एनडीए द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है। उन्हें टिकट न मिलने से अब उनके मंत्री पद पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
विधान परिषद चुनाव ने बढ़ाई चिंता
बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के नाम तय कर दिए हैं, लेकिन इनमें मंत्री दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह चुनाव?
संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।
दीपक प्रकाश फिलहाल किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। ऐसे में विधान परिषद चुनाव उनके लिए सबसे बड़ा अवसर माना जा रहा था।
एनडीए की रणनीति ने बढ़ाए सवाल
एनडीए ने इस बार बीजेपी और जेडीयू को चार-चार सीटें दी हैं, जबकि एक सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के हिस्से में गई है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को कोई सीट नहीं मिलने से राजनीतिक संदेशों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन और भविष्य की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
उपेंद्र कुशवाहा की उम्मीद अभी बाकी
दीपक प्रकाश के पिता और राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने हाल ही में संकेत दिया था कि उन्हें अब भी उम्मीद है कि उनकी पार्टी को प्रतिनिधित्व मिलेगा। हालांकि नामांकन की अंतिम तारीख तक ऐसा होता नहीं दिखा।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी राजनीतिक सोच अब भी जेडीयू की मूल विचारधारा के करीब है और वे एनडीए के साथ मजबूती से खड़े हैं।
