मुरली मनोहर जोशी बोले भारत अभी विश्वगुरु नहीं संस्कृत पर दिया बड़ा संदेश

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने एक कार्यक्रम में ऐसा बयान दिया जिसने राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। संस्कृत भारती के कार्यालय उद्घाटन के दौरान जब उनसे भारत के “विश्वगुरु” होने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि मेरा मानना है कि हमें यह नहीं कहना चाहिए कि भारत अभी विश्वगुरु है। उन्होंने कहा कि भारत कभी विश्वगुरु रहा होगा, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह कहना सही नहीं है कि हम आज विश्वगुरु हैं। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत को भविष्य में विश्वगुरु बनना चाहिए।
संस्कृत को वैश्विक भाषा बनाने पर जोर
मुरली मनोहर जोशी ने संस्कृत भाषा को लेकर बड़ा दावा किया और कहा कि यह भाषा वैश्विक संप्रेषण की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि नासा जैसे वैज्ञानिक संस्थानों में भी संस्कृत की संरचना और वैज्ञानिकता की चर्चा होती रही है। उनके अनुसार संस्कृत में ऐसा ज्ञान समाहित है जिसे सीमित शब्दों में विशाल अर्थों में व्यक्त किया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि संस्कृत को तेजी से विश्व संप्रेषण की भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए ताकि भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिले।

युवाओं से संस्कृत सीखने की अपील और ऐतिहासिक संदर्भ
पूर्व मंत्री ने देश के युवाओं से संस्कृत सीखने की अपील करते हुए कहा कि उन्हें संस्कृत पढ़नी, लिखनी और बोलनी आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में ऐसा विशाल ज्ञान भंडार है जो आधुनिक समय में भी उपयोगी है। अपने संबोधन में उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक ओपेनहाइमर का उदाहरण देते हुए कहा कि परमाणु परीक्षण के समय उन्होंने भगवद गीता का श्लोक याद किया था, जो संस्कृत और भारतीय दर्शन की गहराई को दर्शाता है। उनके अनुसार यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत का प्रभाव केवल धार्मिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक और दार्शनिक भी है।
संस्कृत को अनिवार्य करने और शिक्षा नीति पर विचार
जोशी ने यह भी कहा कि उन्होंने पहले भी एक बैठक में संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां संस्कृत को राजकीय भाषा का दर्जा मिला, लेकिन अपेक्षित स्तर पर इसका विकास नहीं हो सका। उन्होंने चिंता जताई कि आज शिक्षा और व्यापार में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ गया है, जिससे भारतीय भाषाओं को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है। उनके अनुसार यह एक गंभीर विडंबना है, जिस पर देश को गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि भारत अपनी ज्ञान परंपरा को संरक्षित और आगे बढ़ा सके।
