
सावन के दूसरे सोमवार पर समस्तीपुर के शिवालयों में भक्ति का ऐसा रंग दिखा, जहां रात से लगी कतारें सुबह तक लंबी होती चली गईं। कांवड़ियों के जयघोष, मंदिरों की घंटियों और हर-हर महादेव के नारों से पूरा जिला शिवमय नजर आया।
शिवालयों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
समस्तीपुर में सावन के दूसरे सोमवार को विद्यापतिधाम, खुदनेश्वर स्थान और थानेश्वर स्थान मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। कई भक्त रात से ही मंदिरों के बाहर अपनी बारी का इंतजार करते दिखाई दिए। जैसे-जैसे सुबह हुई, शिवालयों में जलाभिषेक के लिए पहुंचने वालों की संख्या बढ़ती गई।
40 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे कांवड़िये
थानेश्वर स्थान मंदिर में इस बार कांवड़ियों का उत्साह खास तौर पर देखने को मिला। बड़ी संख्या में शिवभक्त बेगूसराय के बछवारा स्थित झमटिया घाट से गंगाजल लेकर करीब 40 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए समस्तीपुर पहुंचे। दलसिंहसराय से गुजरते हुए रास्ते में जगह-जगह स्थानीय लोगों ने कांवड़ियों का स्वागत किया।
हर कदम में आस्था, मंजिल में महादेव
कांवड़ यात्रा आसान नहीं होती। लंबी दूरी, थकान और मौसम की चुनौतियों के बावजूद श्रद्धालुओं के कदम नहीं रुके। भक्तों का मानना है कि सावन में भगवान शिव का जलाभिषेक करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के सहारे हजारों शिवभक्त कठिन यात्रा पूरी कर मंदिर पहुंचे और बाबा भोलेनाथ का अभिषेक किया।

विद्यापतिधाम में जुड़ी है अनोखी कथा
विद्यापतिधाम अपनी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के लिए विशेष पहचान रखता है। मान्यता है कि महान कवि विद्यापति की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सेवक ‘उगना’ के रूप में उनके साथ रहने लगे थे। बाद में एक शर्त टूटने पर शिव उगना रूप में अंतर्धान हो गए, जिससे विद्यापति बेहद दुखी हुए।
भक्त की पुकार पर पहुंचीं मां गंगा
लोककथा के अनुसार, मां गंगा के दर्शन की इच्छा लेकर विद्यापति आगे बढ़े। वाजिदपुर पहुंचकर उन्होंने मां गंगा को भावुक होकर पुकारा। मान्यता है कि भक्त की पुकार सुनकर गंगा की जलधारा राजा जनक घाट चमथा से वहां तक पहुंची। इसी पवित्र क्षेत्र में बाद में भगवान शिव का विशाल शिवलिंग प्रकट होने की कथा कही जाती है।
आस्था के आगे छोटी पड़ जाती हैं मुश्किलें
विद्यापतिधाम को श्रद्धालु भक्त और भगवान के मिलन स्थल के रूप में देखते हैं और कई लोग इसे ‘दूसरा देवघर’ भी मानते हैं। सावन में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। दूसरे सोमवार की भीड़ ने एक बार फिर दिखाया कि आस्था केवल मंदिर तक पहुंचने का नाम नहीं, बल्कि कठिन रास्तों पर विश्वास के साथ चलते रहने की ताकत भी है।
