मोदी के 25 साल पूरे होने पर बीजेपी ने गिनाईं उपलब्धियां, मनोज झा ने आर्थिक असमानता पर घेरा

नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में 25 साल पूरे होने पर बीजेपी ने इसे उपलब्धियों के सफर के तौर पर पेश किया। लेकिन जश्न के बीच आरजेडी ने सवालों की नई पोटली खोल दी। बहस विकास के आंकड़ों से आगे बढ़कर असमानता, संपत्ति और आम लोगों की स्थिति तक पहुंच गई।
बीजेपी ने गिनाईं सरकार की उपलब्धियां
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बुधवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नरेंद्र मोदी के 25 साल के राजनीतिक सफर और शासनकाल की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि मोदी के सत्ता संभालने के समय देश में निराशा का माहौल था। उनके मुताबिक, मोदी सरकार ने युवाओं को नई दिशा दी और अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाया।
25 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर आने का दावा
नितिन नवीन ने दावा किया कि मोदी सरकार के नेतृत्व में करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। बीजेपी के लिए यह आंकड़ा सरकार की सामाजिक और आर्थिक नीतियों के प्रभाव को दिखाने वाला बड़ा उदाहरण है। पार्टी ने इसे विकास और कल्याणकारी योजनाओं की सफलता से जोड़कर पेश किया।

मनोज झा ने आंकड़ों पर उठाए सवाल
आरजेडी सांसद मनोज झा ने बीजेपी के दावों को सीधे चुनौती दी। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि बीजेपी नेता आंकड़े किस नजरिए से देखते हैं। उन्होंने संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 39 का हवाला देते हुए आय की असमानता और संपत्ति के कुछ हाथों में केंद्रित होने का मुद्दा उठाया।
‘2013 और आज की तस्वीर सामने रखें’
मनोज झा ने कहा कि किसी भी अर्थव्यवस्था का आकलन केवल GDP या विकास दर से नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल किया कि 2013 में देश में आय की असमानता और संपत्ति के संकेंद्रण की स्थिति क्या थी और आज इसमें कितना बदलाव आया है। उनके मुताबिक, सरकार को इन सवालों के जवाब स्पष्ट आंकड़ों के साथ देने चाहिए।
जश्न के बीच उठाया मानवीय सवाल
बीजेपी के कार्यक्रम पर निशाना साधते हुए मनोज झा ने कहा कि देश के कई परिवारों के ‘चिराग बुझ गए’ हैं और कई राज्य आपदाओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में केवल उपलब्धियों का जश्न मनाने के बजाय लोगों की परेशानियों पर भी ध्यान देना चाहिए।
विकास की बहस अब आंकड़ों से आगे
मोदी के 25 साल का राजनीतिक सफर बीजेपी के लिए उपलब्धियों और बदलाव की कहानी है, जबकि विपक्ष इसी दौर को आर्थिक असमानता और सामाजिक चुनौतियों के आईने में देख रहा है। असली सवाल यही है कि विकास के बड़े आंकड़ों का असर आम नागरिक की जिंदगी पर कितना पड़ा। यही बहस आने वाले समय में राजनीति के केंद्र में रह सकती है।
