गया पितृपक्ष मेला 2026 से पहले ऑनलाइन पिंडदान पर विवाद, पंडा समाज ने जताई आपत्ति

गया में पितृपक्ष मेला 2026 शुरू होने से पहले ऑनलाइन पिंडदान और धार्मिक कर्मकांड को टूरिज्म पैकेज में शामिल किए जाने को लेकर विवाद सामने आया है। बिहार पर्यटन विभाग की पहल पर पंडा समाज ने सवाल उठाते हुए कहा है कि गयाजी की धार्मिक परंपराओं को केवल पर्यटन गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ऑनलाइन ई-पिंडदान को लेकर विरोध
पितृपक्ष मेला 2026 में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के गया पहुंचने की उम्मीद रहती है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बिहार पर्यटन विभाग की ओर से विभिन्न पैकेज तैयार किए गए हैं। इसी के साथ ऑनलाइन ई-पिंडदान की सुविधा भी प्रस्तावित की गई है।
पंडा समाज ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि पिंडदान एक धार्मिक कर्मकांड है, जिसे गयाजी में पारंपरिक विधि और धार्मिक आस्था के साथ संपन्न किया जाता है।
टूरिज्म पैकेज में क्या-क्या शामिल?
पर्यटन विभाग की ओर से तैयार किए गए पैकेज में श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग अवधि के विकल्प रखे गए हैं। इनमें यात्रा, ठहरने और भोजन के साथ धार्मिक स्थलों के दर्शन, पूजन सामग्री तथा पंडा-पुजारी की सेवाओं को शामिल किए जाने की बात सामने आई है।
पंडा समाज का विरोध मुख्य रूप से धार्मिक कर्मकांड को पर्यटन पैकेज के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किए जाने और ऑनलाइन माध्यम से पिंडदान की व्यवस्था को लेकर है।

पंडा समाज ने गयाजी की धार्मिक पहचान का दिया हवाला
पंडा समाज का कहना है कि सरकार श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिवहन, आवास, स्वच्छता और अन्य व्यवस्थाओं को बेहतर करे, लेकिन पिंडदान की धार्मिक प्रक्रिया को पर्यटन गतिविधि के तौर पर पेश करने से इसकी पारंपरिक प्रकृति प्रभावित हो सकती है।
उनके अनुसार, गयाजी को सनातन परंपरा में पितृकर्म के प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट समेत कई स्थानों पर पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु तर्पण और पिंडदान करते हैं।
भगवान राम और माता सीता से जुड़ी धार्मिक मान्यता
गया में पिंडदान से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में भगवान राम और माता सीता की कथा का विशेष उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान पिता दशरथ के निधन के बाद भगवान राम पिंडदान के लिए गया पहुंचे थे।
कथा के अनुसार, जब राम और लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री जुटाने गए थे, तब माता सीता ने फल्गु नदी के तट पर दशरथ के लिए पिंडदान किया। इस धार्मिक कथा में फल्गु नदी, गाय, ब्राह्मण, कौआ, तुलसी और अक्षयवट को घटना का साक्षी बताया गया है।
यह कथा धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है, जबकि इसके ऐतिहासिक पक्ष को अलग संदर्भ में देखा जाता है।
सरकार और पंडा समाज के बीच सहमति पर नजर
पितृपक्ष मेला शुरू होने से पहले अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऑनलाइन ई-पिंडदान और टूरिज्म पैकेज को लेकर सरकार और पंडा समाज के बीच किस तरह का समाधान निकलता है।
एक तरफ पर्यटन विभाग श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक व्यवस्थाएं तैयार करने पर जोर दे रहा है, वहीं पंडा समाज धार्मिक कर्मकांड की पारंपरिक पद्धति और गयाजी की धार्मिक पहचान को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर होने वाली बातचीत से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
