
दिल्ली सरकार अब अपनी खाली सरकारी जमीनों का बेहतर इस्तेमाल कर आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डूसिब) की जमीन पर स्पोर्ट्स टर्फ, गोदाम और अन्य व्यावसायिक सुविधाएं विकसित करने की योजना पर काम शुरू हो गया है। इसके लिए वैश्विक कंसल्टेंसी फर्म अर्न्स्ट एंड यंग (EY) को सर्वे और व्यावसायिक संभावनाओं का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
डूसिब की जमीन का होगा व्यावसायिक उपयोग
दिल्ली सरकार चाहती है कि डूसिब के पास मौजूद जमीनों का उपयोग केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उनसे स्थायी आय भी अर्जित की जाए। इसी उद्देश्य से ईवाई शहरभर में डूसिब की संपत्तियों का सर्वे कर रही है और यह तय कर रही है कि किन स्थानों पर स्पोर्ट्स टर्फ, गोदाम या अन्य कमाई वाले प्रोजेक्ट विकसित किए जा सकते हैं।
मौजूदा आय जरूरतों के मुकाबले कम
वर्तमान में डूसिब अपनी 17 पार्किंग साइटों से हर साल करीब 3.5 से 4 करोड़ रुपये की आय अर्जित करता है। वहीं, शादी-विवाह और सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए जमीन लीज पर देकर करीब 11 करोड़ रुपये की कमाई होती है। लेकिन बढ़ते खर्च और भविष्य की विकास योजनाओं को देखते हुए यह आय पर्याप्त नहीं मानी जा रही है।

900 एकड़ जमीन को सुरक्षित करने की भी योजना
दिल्ली सरकार डूसिब की लगभग 900 एकड़ जमीन की पहचान, मैपिंग, बाउंड्री वॉल निर्माण और अतिक्रमण रोकने के लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने की तैयारी में है। इस अभियान का उद्देश्य सरकारी संपत्तियों को सुरक्षित रखते हुए उनका बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
बेघरों के लिए बढ़ेंगी सुविधाएं
डूसिब अपने विस्तार कार्यक्रम के तहत दिल्ली में 12 नए पक्के रैन बसेरे और अतिरिक्त जन सुविधा परिसर विकसित करने की योजना बना रहा है। प्रत्येक नए रैन बसेरे में लगभग 500 लोगों के ठहरने की क्षमता होगी। फिलहाल राजधानी में 64 स्थायी रैन बसेरे और 673 जन सुविधा परिसर संचालित हैं, जो झुग्गी-बस्तियों और जरूरतमंद लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं।
आय और जनकल्याण का संतुलित मॉडल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी जमीनों का योजनाबद्ध और पारदर्शी तरीके से व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, तो इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। साथ ही इस आय का उपयोग रैन बसेरों, स्वच्छता सुविधाओं और शहरी गरीबों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया जा सकेगा। आने वाले समय में यह मॉडल दिल्ली में सरकारी संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन की नई मिसाल बन सकता है।
