बिहार जेल में बड़ा खेल! बेल किसी और को, जेल से निकल गया कोई और

बिहारशरीफ मंडल कारा में कैदी की रिहाई के दौरान कथित पहचान संबंधी गड़बड़ी ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जमानत बड़े भाई को मिली, लेकिन बाहर छोटा भाई निकल गया। करीब एक सप्ताह बाद मामला सामने आया, जिसके बाद जेल उपाधीक्षक समेत तीन कर्मियों को निलंबित कर दिया गया।
जमानत बड़े भाई को, रिहा हो गया छोटा भाई
बिहार के बिहारशरीफ मंडल कारा से कैदी की रिहाई में कथित लापरवाही का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि 24 सितंबर को सतीश चौहान की रिहाई होनी थी, लेकिन जेल प्रशासन की पहचान संबंधी चूक के कारण उसका छोटा भाई चंद्रदीप चौहान जेल से बाहर निकल गया। इस घटना ने जेल की सुरक्षा व्यवस्था और रिहाई प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सात दिन तक कैसे छिपी रही गड़बड़ी?
हैरानी की बात यह है कि कथित गड़बड़ी के बाद करीब एक सप्ताह तक जेल प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं हुई। एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट के बाद मामला सामने आया। रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि जमानत पाने वाला सतीश जेल में ही बंद था, जबकि उसकी जगह उसका भाई बाहर जा चुका था।
नाम और पिता की पहचान बनी उलझन?
दोनों भाई अस्थावां थाना क्षेत्र के रहने वाले हैं। सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद की उम्र 27 वर्ष, जबकि चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद की उम्र 25 वर्ष बताई गई है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, नाम और पिता के नाम में समानता के कारण पहचान में भ्रम होने की आशंका जताई गई। हालांकि, वास्तविक चूक कैसे हुई, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

दूसरे मामले में जमानत लंबित होने का सवाल
मामले का एक और अहम पहलू यह है कि चंद्रदीप के खिलाफ दूसरे आपराधिक मामले में जमानत लंबित बताई गई थी। इसके बावजूद उसके जेल से बाहर निकलने पर सवाल उठ रहे हैं। गड़बड़ी सामने आने के बाद उसने अपने अधिवक्ता के निर्देश पर अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया। अब यह जांचना जरूरी है कि रिहाई से पहले सभी मामलों की स्थिति का सत्यापन हुआ था या नहीं।
छेड़खानी और मारपीट के आरोपों से जुड़ा मामला
दोनों भाइयों के खिलाफ अस्थावां थाना क्षेत्र में युवती से छेड़खानी और विरोध करने पर मारपीट के आरोपों को लेकर प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी है। अलग-अलग मामलों में कार्रवाई के बाद दोनों को जेल भेजा गया था। इन आरोपों का अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना है।
जेल उपाधीक्षक समेत तीन कर्मी निलंबित
प्रारंभिक जांच और संबंधित कर्मियों से मिले जवाबों के आधार पर जेल प्रशासन ने मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी। इसके बाद जेल उपाधीक्षक अरविंद कुमार समेत तीन कर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। अब जांच का मुख्य सवाल यही है कि रिहाई के समय पहचान और कानूनी रिकॉर्ड का मिलान किस स्तर पर चूका।
बिहारशरीफ मंडल कारा की यह घटना केवल एक प्रशासनिक गलती का मामला नहीं है। यह याद दिलाती है कि जेल से किसी बंदी की रिहाई में छोटी-सी चूक भी न्यायिक प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। आखिर एक कैदी की पहचान बदलने जैसी गंभीर गड़बड़ी सात दिनों तक पकड़ में क्यों नहीं आई? इसका स्पष्ट जवाब जांच के निष्कर्षों से ही सामने आएगा।
