
विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव जहां पीडीए और जातीय समीकरणों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं भाजपा भी जवाबी रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों के अनुसार भाजपा इस बार पश्चिमी यूपी के संगठन में क्षेत्रीय अध्यक्ष पद पर किसी गुर्जर नेता को बैठाने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि इस कदम से पार्टी इलाके में अपनी जातीय संतुलन की राजनीति को और मजबूत करना चाहती है।
गुर्जर नेता को क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाने की तैयारी, दिल्ली से मिली मंजूरी
भाजपा की इस संभावित रणनीति को दिल्ली नेतृत्व से भी हरी झंडी मिल चुकी है। पार्टी संगठन में तीन गुर्जर नेताओं के नामों पर विचार किया जा रहा है, जिनमें गौतमबुद्ध नगर के एक प्रमुख नेता का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। संभावना है कि मई के पहले सप्ताह में प्रदेश कार्यकारिणी के साथ इस फैसले की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है। इससे पहले भाजपा ने दो बार जाट नेताओं और एक बार त्यागी तथा राजपूत समाज से जुड़े नेताओं को क्षेत्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है, लेकिन गुर्जर समाज को अब तक यह अवसर नहीं मिला था।

गुर्जर समाज की नाराजगी और बदलता राजनीतिक समीकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर समाज की आबादी और राजनीतिक प्रभाव को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। गुर्जर नेताओं का दावा है कि उनकी जनसंख्या क्षेत्र में काफी अधिक है, जबकि जाट समुदाय भी अपनी मजबूत उपस्थिति का दावा करता है। भाजपा में अब तक गुर्जर समाज को संगठन और सरकार में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से नाराजगी देखी जा रही थी। इसी असंतोष को दूर करने और वोट बैंक को साधने के लिए पार्टी अब उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने पर विचार कर रही है। यह कदम सीधे तौर पर सपा की जातीय रणनीति को चुनौती देने के रूप में देखा जा रहा है।
सपा की बढ़ती सक्रियता से भाजपा सतर्क, चुनाव से पहले बढ़ी हलचल
समाजवादी पार्टी ने भी पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज को साधने के लिए कई प्रयास तेज कर दिए हैं, जिसमें बड़े सम्मेलन और क्षेत्रीय संपर्क अभियान शामिल हैं। हाल ही में दादरी में हुए गुर्जर सम्मेलन में भारी भीड़ देखने को मिली, जिसने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। इसी के बाद भाजपा भी सक्रिय हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर गुर्जर समाज किसी एक पक्ष की ओर झुकता है तो इसका असर कई विधानसभा सीटों पर देखने को मिल सकता है। इसी कारण भाजपा इस रणनीतिक बदलाव को बेहद अहम मान रही है, और अब सभी की नजर लखनऊ से होने वाली अंतिम घोषणा पर टिकी है।
