
बिहार सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जेडीयू नेता और मंत्री निशांत कुमार ने एबीपी न्यूज़ से खास बातचीत में अपने भविष्य के रोडमैप को लेकर महत्वपूर्ण संकेत दिए। उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और अपने पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करेंगे। निशांत कुमार ने बिहार की जनता का आभार जताते हुए कहा कि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जनता ने एनडीए को भारी बहुमत देकर एक बार फिर भरोसा जताया है। उनके इस बयान को राजनीतिक रूप से उनके बढ़ते कद और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है।
परिवारवाद के सवाल पर निशांत की प्रतिक्रिया
जब उनसे परिवारवाद को लेकर सवाल पूछा गया तो निशांत कुमार ने इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से परहेज किया और कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें जो जिम्मेदारी दी है, उसे वे पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे राजनीतिक बहसों से ज्यादा अपने काम पर ध्यान देना चाहते हैं। निशांत 8 मार्च को ही जेडीयू में शामिल हुए थे और अब मंत्री बनने के बाद यह चर्चा तेज है कि उन्हें जल्द ही कोई अहम विभाग भी सौंपा जा सकता है, जिसकी औपचारिक घोषणा कुछ घंटों में हो सकती है।

बिहार में 22 दिन बाद पहला बड़ा मंत्रिमंडल विस्तार
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी सरकार का यह पहला बड़ा मंत्रिमंडल विस्तार है, जो गठन के 22 दिनों बाद किया गया। इस विस्तार में कुल 32 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई, जो गांधी मैदान में आयोजित भव्य समारोह में संपन्न हुआ। राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने सभी मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह को पांच-पांच मंत्रियों के समूह में आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की एकजुटता और शक्ति प्रदर्शन साफ नजर आया।
एनडीए के बड़े नेताओं की मौजूदगी और नए समीकरण
इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा सहित एनडीए के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे, जिससे इस कार्यक्रम का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया। इस मंत्रिमंडल विस्तार में भाजपा, जेडीयू, एलजेपी (रामविलास), हम और आरएलएम सभी घटक दलों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। निशांत कुमार और दीपक प्रकाश जैसे नए चेहरों को शामिल करके गठबंधन ने युवा नेतृत्व को भी आगे लाने का संकेत दिया है। वहीं कई पुराने मंत्रियों की वापसी और कुछ बड़े नामों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
