
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए CJP प्रदर्शन के दौरान हिंसा के मामले में क्राइम ब्रांच ने नई FIR दर्ज की है। पुलिस का फोकस अब उन लोगों की पहचान पर है, जिनकी भूमिका हिंसा में कथित तौर पर रही और यह पता लगाने पर भी है कि कहीं पूरा घटनाक्रम पहले से बनाई गई साजिश का हिस्सा तो नहीं था।
यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस पहले ही सतर्क है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नया मामला
20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों को लेकर दिल्ली के अलग-अलग थानों में दर्ज 17 FIR को सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को रद्द कर दिया था। हालांकि, अदालत ने पुलिस को 2,873 ऐसे लोगों के खिलाफ अलग जांच की अनुमति दी, जिन्हें पुलिस ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाला बताया था। इसी आधार पर नई FIR का रास्ता खुला।
इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी लोगों को हिंसा में शामिल माना गया है। जांच का उद्देश्य उनकी वास्तविक भूमिका का पता लगाना है।
पुलिस वाहनों को नुकसान और बल प्रयोग के आरोप
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी। पुलिस के अनुसार बैरिकेड तोड़ने और आगे बढ़ने की कोशिश के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई और बल प्रयोग करना पड़ा। हिंसा में पुलिसकर्मियों पर कथित हमले, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आए थे।

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने का आरोप लगाया था। ऐसे में नई जांच में घटनास्थल के वीडियो और दूसरे डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
2,873 लोगों की पहचान कैसे हुई?
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर तैनात फेसियल रिकग्निशन सिस्टम के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनके आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस डेटाबेस में मौजूद थे। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि तकनीक का इस्तेमाल विशेष रूप से आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान के लिए किया गया था।
हालांकि, इस तकनीक की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठे हैं। एक जांच में ऐसे मामले सामने आए जहां फेसियल रिकग्निशन ने जेल में बंद लोगों को भी प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बताया। इसलिए नई जांच में सिर्फ तकनीकी पहचान के आधार पर कार्रवाई के बजाय फील्ड वेरिफिकेशन अहम होगा।
अब साजिश और आपराधिक भूमिका की होगी पड़ताल
क्राइम ब्रांच अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि 20 जुलाई की हिंसा में वास्तव में कौन लोग शामिल थे, किसने भीड़ को उकसाया और क्या हिंसा सुनियोजित थी। इसके लिए पुलिस CCTV फुटेज, मोबाइल वीडियो, ड्रोन फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर सकती है।
नई FIR ने जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े विवाद को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। अब जांच की असली कसौटी यही होगी कि पुलिस तकनीकी पहचान और आरोपों से आगे बढ़कर ठोस साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय कर पाती है या नहीं। लोकतांत्रिक प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था—दोनों के बीच संतुलन इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल बना रहेगा।
