
दुनिया के कई देश इन दिनों बढ़ते कर्ज और महंगाई की परेशानी से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार भी आने वाले सालों को ध्यान में रखकर देश की आर्थिक हालत मजबूत करने की तैयारी में जुटी है। सरकार का मकसद देश पर कर्ज का बोझ कम करना और अर्थव्यवस्था को इस तरह आगे बढ़ाना है कि विकास के काम भी चलते रहें और सरकारी खजाने पर दबाव भी कम हो।
भारत का कर्ज आने वाले समय में कितना रहेगा और इसे कम करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहम सवाल है। सरकार की योजना के तहत साल 2030 तक कर्ज को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के करीब 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। जीडीपी का मतलब देश में एक साल के दौरान तैयार होने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कुल कीमत से है। इसी के आधार पर यह समझा जाता है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है और उसके मुकाबले कर्ज कितना है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विकास के काम रुकने नहीं चाहिए। सड़कें बनानी हैं अस्पताल और स्कूल बेहतर करने हैं रोजगार के मौके बढ़ाने हैं और देश में कारोबार को भी आगे बढ़ाना है। इन सभी कामों के लिए पैसे की जरूरत होती है। अगर सरकार की कमाई और खर्च के बीच का अंतर ज्यादा रहता है तो उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है।
कर्ज का बोझ घटाने के लिए सरकार को अपनी कमाई बढ़ाने और खर्च को सही तरीके से संभालने पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ाना सरकारी योजनाओं पर खर्च का बेहतर इस्तेमाल करना और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनाए रखना भी जरूरी होगा। जब देश की जीडीपी बढ़ती है तो उसके मुकाबले कर्ज का अनुपात कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा। दुनिया में तेल की कीमतों में बदलाव युद्ध जैसी स्थितियां और आर्थिक सुस्ती भारत की योजनाओं पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में सरकार को विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।
अगर सरकार तय लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। इससे भविष्य में ब्याज के भुगतान का दबाव कम करने और विकास के लिए संसाधन जुटाने में मदद मिल सकती है। अब देखना होगा कि सरकार अपनी योजना को किस तरह लागू करती है और 2030 तक इस लक्ष्य के कितने करीब पहुंच पाती है।
