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Health Trackers: फिटनेस बैंड या स्मार्टवॉच? जानिए कौन सा हेल्थ ट्रैकर है आपके लिए बेस्ट!
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नकली ऐप्स दिखते हैं असली जैसे जानिए कैसे पहचानें और बचाएं अपनी मेहनत की कमाई
देश में इन दिनों फर्जी ट्रेडिंग ऐप्स के जरिए लोगों को ठगने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस गंभीर खतरे को देखते हुए सरकार ने नई एडवायजरी जारी की है और लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। ठग आकर्षक रिटर्न का लालच देकर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं और बाद में उनकी मेहनत की कमाई हड़प लेते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये ऐप्स दिखने में बिल्कुल असली प्लेटफॉर्म जैसे लगते हैं जिससे आम लोगों के लिए असली और नकली के बीच फर्क करना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग इस स्कैम का शिकार हो रहे हैं।
कैसे काम करता है यह खतरनाक स्कैम
सरकारी एडवायजरी के अनुसार फर्जी ट्रेडिंग ऐप्स का इंटरफेस और डिजाइन बड़े और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म्स जैसा बनाया जाता है। ठग सोशल मीडिया विज्ञापनों मैसेजिंग ऐप्स और फर्जी लिंक के जरिए लोगों को इन ऐप्स को डाउनलोड करने के लिए प्रेरित करते हैं। एक बार जब यूजर ऐप इंस्टॉल कर लेता है तो उसे निवेश के नाम पर पैसा जमा करने के लिए कहा जाता है। असल में यह पैसा किसी निवेश में नहीं लगता बल्कि सीधे ठगों के बैंक खातों में चला जाता है। कई बार यूजर को फर्जी डैशबोर्ड पर मुनाफा दिखाया जाता है ताकि वह और ज्यादा पैसा निवेश करे। इस तरह धीरे धीरे यूजर बड़ी रकम गंवा बैठता है।

बचाव के लिए जरूरी सावधानियां
सरकार ने इस तरह के स्कैम से बचने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां बताई हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले किसी भी ऐप में पैसा निवेश करने से पहले बैंक डिटेल्स को ऑफिशियल सोर्स से जरूर जांचें। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि पैसा सही जगह जा रहा है। दूसरी बात यह है कि हमेशा UPI हैंडल और पेमेंट गेटवे की सत्यता की जांच करें क्योंकि फर्जी ऐप्स अक्सर संदिग्ध पेमेंट विकल्प इस्तेमाल करती हैं। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी ट्रेडिंग ऐप को डाउनलोड करने से पहले उसके वेरिफाइड लेबल या प्रमाणन को जरूर देखें। यह एक अहम संकेत होता है कि प्लेटफॉर्म सुरक्षित और कानूनी है।
स्कैम का शिकार होने पर तुरंत करें यह काम
अगर कोई व्यक्ति इस तरह के फाइनेंशियल स्कैम का शिकार हो जाता है तो उसे तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। देरी करने से पैसे वापस मिलने की संभावना कम हो जाती है। ऐसे मामलों में तुरंत नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करना चाहिए और पूरी जानकारी देनी चाहिए। इसके अलावा सरकार के साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। समय रहते सही कदम उठाने से नुकसान को कम किया जा सकता है और ठगों के खिलाफ कार्रवाई में मदद मिलती है।
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साइबर अपराध पर डिजिटल स्ट्राइक की तैयारी, सरकार ने बनाया बड़ा सुरक्षा प्लान
पिछले कुछ वर्षों में साइबर क्राइम के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। ऑनलाइन ठगी और डेटा चोरी के मामलों ने आम लोगों को आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक तनाव भी दिया है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार ने देशभर में साइबर अपराध के खिलाफ एक बड़ी रणनीति तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने साइबर फ्रॉड को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा है कि डेटा चोरी और साइबर धोखाधड़ी देश के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। इस चुनौती से निपटने के लिए Indian Cyber Crime Coordination Centre के माध्यम से एक व्यापक योजना तैयार की जा रही है जो अलग अलग एजेंसियों को एक साथ जोड़कर काम करेगी।
2018 में हुई थी I4C की शुरुआत
I4C यानी इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर की स्थापना वर्ष 2018 में की गई थी। यह संस्था गृह मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है और देश में साइबर अपराध से निपटने के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप में काम करती है। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न राज्यों की पुलिस एजेंसियों बैंकिंग सिस्टम और अन्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है। I4C एक ऐसा प्लेटफॉर्म प्रदान करता है जहां सभी संबंधित एजेंसियां मिलकर साइबर अपराध की जांच और रोकथाम में सहयोग करती हैं। इससे न केवल मामलों की जांच तेज होती है बल्कि अपराधियों तक पहुंचना भी आसान हो जाता है।

शिकायत से लेकर कार्रवाई तक की पूरी प्रक्रिया
जब कोई नागरिक साइबर फ्रॉड की शिकायत हेल्पलाइन नंबर या ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से दर्ज करता है तो यह शिकायत सीधे I4C के अंतर्गत आने वाले सिस्टम में दर्ज हो जाती है। इसके बाद यह मामला ‘सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम’ के माध्यम से संबंधित स्थानीय पुलिस और बैंक तक पहुंचता है। इस प्रक्रिया के जरिए ठगी के पैसे को तुरंत फ्रीज करने की कार्रवाई की जाती है ताकि अपराधियों को धन निकालने का मौका न मिले। रिपोर्ट के अनुसार इस प्रणाली के जरिए अब तक हजारों करोड़ रुपये की राशि को फ्रॉड होने से बचाया जा चुका है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP भी लागू है जिसमें पुलिस बैंक और अन्य एजेंसियां मिलकर काम करती हैं।
सिम कार्ड ब्लॉकिंग और सिम बाइंडिंग से कसा शिकंजा
सरकार केवल शिकायतों पर ही कार्रवाई नहीं कर रही है बल्कि साइबर अपराध में इस्तेमाल होने वाले सिम कार्ड और मोबाइल डिवाइस पर भी सख्ती बरत रही है। गृह मंत्रालय के अनुसार अब तक लाखों सिम कार्ड ब्लॉक किए जा चुके हैं और कई मोबाइल उपकरणों को भी निष्क्रिय किया गया है। इसके अलावा मैसेजिंग ऐप्स पर साइबर अपराध रोकने के लिए सिम बाइंडिंग को अनिवार्य किया जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत यूजर का सिम और ऐप एक दूसरे से जुड़ा रहेगा जिससे फर्जी अकाउंट और धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाएगी। सरकार ने सभी प्लेटफॉर्म्स को इसे लागू करने के लिए समय सीमा दी है और उम्मीद जताई जा रही है कि इन कदमों से साइबर अपराध के मामलों में उल्लेखनीय कमी आएगी।
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