
एटा की मारहरा विधानसभा सीट पर बीजेपी ने 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने मुकाबले को बेहद करीबी बना दिया। यादव-मुस्लिम के साथ शाक्य वोटों का समर्थन सपा की ताकत बना, जबकि बीजेपी के सामने 2027 में अपनी बढ़त कायम रखने की चुनौती होगी।
मारहरा सीट का चुनावी इतिहास क्या कहता है?
उत्तर प्रदेश की मारहरा विधानसभा सीट संख्या 105 है। यह सीट लोधी और यादव बहुल मानी जाती है। यहां जातीय समीकरणों के साथ प्रत्याशियों की सामाजिक पृष्ठभूमि भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है।
मारहरा सीट पर 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा के अमित गौरव यादव विधायक बने थे। इसके बाद 2017 और 2022 में बीजेपी ने जीत हासिल की। बीजेपी के वीरेन्द्र लोधी ने 2022 में सपा के अमित गौरव यादव को हराकर विधानसभा में जगह बनाई।
2022 में बीजेपी ने 18 हजार वोटों से दर्ज की जीत
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और सपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला। बीजेपी के वीरेन्द्र लोधी को 1,01,387 वोट मिले, जबकि सपा के अमित गौरव यादव को 83,778 वोट हासिल हुए।
| पार्टी | प्राप्त वोट |
|---|---|
| बीजेपी | 1,01,387 |
| सपा | 83,778 |
| बसपा | 16,900 |
| कांग्रेस | 852 |
बीजेपी ने सपा को करीब 17,600 वोटों से हराया। बसपा को लगभग 17 हजार वोट मिले, जबकि कांग्रेस 1,000 का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी।
इस चुनाव में बीजेपी को लोधी, शाक्य और सामान्य वर्ग के विभिन्न समुदायों का समर्थन मिला। वहीं सपा का आधार मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत रहा। बसपा को अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक का समर्थन मिला।
2024 में कैसे बदल गया चुनावी मुकाबला?
2024 के लोकसभा चुनाव में एटा सीट पर बीजेपी ने लोधी समाज से और सपा ने शाक्य समाज से प्रत्याशी उतारा। मारहरा विधानसभा क्षेत्र में दोनों दलों के बीच मुकाबला पहले से ज्यादा करीबी हो गया।
| पार्टी | प्राप्त वोट |
|---|---|
| बीजेपी | 93,724 |
| सपा | 90,889 |
| बसपा | 13,139 |
इस बार बीजेपी को सपा पर केवल 2,835 वोटों की बढ़त मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में जीत का अंतर काफी कम हो गया। हालांकि दोनों चुनाव अलग-अलग प्रकार के थे, इसलिए इनके नतीजों की सीधी तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है।

शाक्य वोटों ने सपा की उम्मीदों को दी मजबूती
2024 के नतीजों की एक अहम व्याख्या यह है कि सपा को यादव और मुस्लिम मतदाताओं के साथ शाक्य समाज के एक हिस्से का भी समर्थन मिला। उपलब्ध चुनावी विश्लेषण के मुताबिक, शाक्य वोट बीजेपी और सपा के बीच बंटे, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया।
बीजेपी को लोधी और सामान्य वर्ग के मतदाताओं का समर्थन मिलने के साथ अनुसूचित जाति के कुछ समुदायों के वोट भी मिले। दूसरी ओर, सपा को मिले अतिरिक्त समर्थन ने उसके कुल वोट बढ़ाने में मदद की।
बसपा के वोट भी 2022 के मुकाबले घटे। राजनीतिक विश्लेषण में माना जा रहा है कि बसपा के कुछ मतदाताओं का समर्थन दूसरे दलों की ओर गया होगा, लेकिन केवल नतीजों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कितने वोट किस पार्टी को स्थानांतरित हुए।
मारहरा का जातीय समीकरण क्यों है अहम?
मारहरा में लोधी और यादव मतदाताओं की बड़ी संख्या है। इसके अलावा अनुसूचित जाति, मुस्लिम, शाक्य, ठाकुर और निषाद समुदाय भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
उपलब्ध अनुमान के अनुसार, यहां लोधी मतदाताओं की संख्या करीब 75 हजार और यादव मतदाताओं की संख्या लगभग 60 हजार बताई जाती है। अनुसूचित जाति के करीब 50 हजार, मुस्लिम समुदाय के 25 हजार और शाक्य समाज के लगभग 22 हजार मतदाता होने का अनुमान है। ये आंकड़े अनुमानित हैं, आधिकारिक जातिवार मतदाता गणना नहीं।
ऐसे समीकरण में किसी एक समुदाय का समर्थन निर्णायक हो सकता है। हालांकि मतदान का व्यवहार केवल जाति से तय नहीं होता; स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि, पार्टी का संगठन और सरकार के कामकाज की धारणा भी महत्वपूर्ण रहती है।
SIR के बाद घटे 22,340 मतदाता
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में मारहरा विधानसभा क्षेत्र में 3,15,245 मतदाता थे। 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद यह संख्या घटकर 2,92,905 रह गई। इस तरह मतदाताओं की संख्या में 22,340 की कमी दर्ज बताई गई है।
मतदाता सूची में इस बदलाव का 2027 के चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, यह सूची के अंतिम स्वरूप, नए पंजीकरण और मतदान के रुझान पर निर्भर करेगा। केवल मतदाताओं की संख्या घटने से किसी दल को सीधा फायदा या नुकसान मानना सही नहीं होगा।
2027 में बीजेपी के सामने अपनी बढ़त बचाने की चुनौती
मारहरा में बीजेपी ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीते हैं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अंतर काफी कम कर दिया। यही नतीजा सपा के लिए 2027 की उम्मीदों को मजबूत करने वाला संकेत माना जा सकता है।
अगर सपा यादव-मुस्लिम समर्थन के साथ शाक्य और अन्य समुदायों में अपनी पहुंच बढ़ाती है, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। दूसरी ओर, बीजेपी को अपनी पारंपरिक सामाजिक पकड़ बनाए रखने और विभिन्न समुदायों का समर्थन बरकरार रखने की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: मारहरा की लड़ाई में 2027 का नतीजा केवल पिछले चुनावों के आंकड़ों से तय नहीं होगा। उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे और अलग-अलग समुदायों का मतदान व्यवहार अहम भूमिका निभाएंगे। फिलहाल 2024 के करीबी मुकाबले ने यह जरूर दिखाया है कि मारहरा में सपा की चुनौती को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।
