
Kunwar Vijay Shah के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी में देरी पर Supreme Court of India ने कड़ी नाराजगी जताई है। यह मामला उस विवादित टिप्पणी से जुड़ा है जो मध्य प्रदेश के आदिवासी मामलों के मंत्री ने भारतीय सेना की अधिकारी Colonel Sophia Qureshi को लेकर की थी। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने पहले दिए गए निर्देशों का पालन समय पर नहीं किया, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। इस मामले की पृष्ठभूमि में कर्नल कुरैशी का वह रोल भी शामिल है जिसमें उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मीडिया को महत्वपूर्ण जानकारी दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी और सरकार को सख्त संदेश
मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकार की देरी पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब बस आदेश का पालन किया जाए और बहुत हो चुका है। अदालत ने साफ कहा कि पहले दिए गए निर्देश के बावजूद दो हफ्तों के भीतर निर्णय नहीं लिया गया, जो अदालत की अवमानना के समान है। कोर्ट ने राज्य सरकार को फिर से निर्देश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले में फैसला ले और सभी परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करे। इस सख्त रुख के बाद सरकार पर दबाव और बढ़ गया है और मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की गई है।

सॉलिसिटर जनरल की दलील और सुप्रीम कोर्ट की असहमति
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश Tushar Mehta ने दलील दी कि मंत्री की टिप्पणी दुर्भाग्यपूर्ण थी और संभवतः उनका उद्देश्य गलत तरीके से व्यक्त हुआ था। उन्होंने कहा कि यह एक गलतफहमी या जुबान फिसलने का मामला हो सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत नहीं हुआ और कहा कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति अपने शब्दों के प्रति जिम्मेदार होते हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर यह वास्तव में गलती होती, तो तुरंत बिना किसी दबाव के माफी मांगी जाती। कोर्ट ने यह भी कहा कि राजनेताओं को अपनी बात कहने की पूरी समझ होती है और ऐसे बयान हल्के में नहीं लिए जा सकते।
माफी और जांच रिपोर्ट पर भी उठे सवाल
वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने अदालत को बताया कि मंत्री ने पहले ही सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस माफी की ईमानदारी पर भी सवाल उठा दिए। अदालत ने कहा कि केवल कानूनी दबाव के बाद दी गई माफी वास्तविक नहीं मानी जा सकती। सुनवाई के दौरान विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट का भी जिक्र हुआ जिसमें संकेत मिला कि मंत्री के खिलाफ पहले भी इस तरह के बयान सामने आए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गंभीरता से जांच और निर्णय जरूरी है, खासकर जब मामला सेना की महिला अधिकारी की गरिमा से जुड़ा हो। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिसमें राज्य सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
