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15 Habits that could be hurting your business relationships

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RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

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RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

मुद्रास्फीति के दबाव में लगातार कमी के कारण भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपनी आगामी मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती कर सकता है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है, और इसमें बदलाव का सीधा असर लोन और EMI पर पड़ता है। पिछले दो महीनों से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति सरकार के लक्ष्य सीमा (4%-6%) के निचले स्तर से भी नीचे चल रही है, जिससे ब्याज दरों में कटौती की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, देश की दूसरी तिमाही की बेहतर-than-expected 8.2% जीडीपी वृद्धि की वजह से कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार भी दरों को स्थिर रखा जा सकता है।

विशेषज्ञों की राय: कटौती पर मतभेद

देश की आर्थिक स्थिति में सुधार और तेज रिकवरी ने विशेषज्ञों को दो हिस्सों में बांट दिया है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक गतिविधियों में मजबूती, राजकोषीय सुधार, पब्लिक निवेश में वृद्धि और जीएसटी दरों में कटौती जैसे कदमों ने अर्थव्यवस्था को अच्छा सहारा दिया है। इसलिए, आरबीआई इस समय दरों को स्थिर रख सकता है। वहीं, दूसरी ओर कई विशेषज्ञों का मानना है कि कम होती मुद्रास्फीति और महंगाई का दबाव घटने के कारण 0.25% की दर कटौती बिलकुल संभव है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 3 से 5 दिसंबर 2025 तक निर्धारित है, और निर्णय की घोषणा गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 दिसंबर को करेंगे। पिछले साल फरवरी से अगस्त तक आरबीआई कुल 1% की कटौती कर चुका है, जिसके बाद दरें 5.5% पर स्थिर हैं।

RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

HDFC और SBI रिपोर्टों में नई संकेतक

एचडीएफसी बैंक की नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में वृद्धि के अनुमान से अधिक जीडीपी प्रदर्शन और अपेक्षा से कम मुद्रास्फीति ने स्थिति को रोचक बना दिया है। रिपोर्ट में लिखा है कि यदि तीसरी तिमाही तक मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत से नीचे रहती है और दूसरी छमाही में वृद्धि पर जोखिम बढ़ते हैं, तो आरबीआई 0.25 प्रतिशत की कटौती कर सकता है। वहीं, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के आर्थिक अनुसंधान विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत जीडीपी वृद्धि और न्यूनतम मुद्रास्फीति के बीच आरबीआई को बाजारों को यह संकेत देना होगा कि आगे ब्याज दरों की दिशा क्या रहने वाली है। इन रिपोर्टों ने दर कटौती की उम्मीदों को और मजबूत किया है।

आर्थिक स्थिरता और ब्याज दरों पर आगे की राह

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि इस बार का निर्णय बेहद “कड़े मुकाबले” वाला हो सकता है, क्योंकि मौद्रिक नीति भविष्य की दिशा पर आधारित होती है। फिलहाल, वे मानते हैं कि मौजूदा रेपो रेट अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त स्तर पर है। यदि दरें घटती हैं, तो इसका फायदा गृह ऋण, कार लोन और अन्य कर्ज वाले उपभोक्ताओं को मिलेगा, जिससे बाजार में मांग बढ़ सकती है। वहीं, यदि आरबीआई दरें स्थिर रखता है, तो यह संकेत हो सकता है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक वृद्धि को लेकर आत्मविश्वास में है। अब नजरें बैठक पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि आने वाले महीनों में महंगाई, लोन और निवेश की दिशा क्या होगी।

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PSU Bank Merger: सार्वजनिक बैंकों का विलय, छोटे बैंक होंगे समाप्त, क्या आपके लेन-देन पर होगा बड़ा असर?

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PSU Bank Merger: सार्वजनिक बैंकों का विलय, छोटे बैंक होंगे समाप्त, क्या आपके लेन-देन पर होगा बड़ा असर?

PSU Bank Merger: देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या और कम होने वाली है। सरकार छोटे बैंकों को बड़े बैंकों में विलय कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे बैंकों को एक मजबूत बैंक में बदलकर उनकी संचालन क्षमता, वित्तीय स्वास्थ्य और ऋण देने की क्षमता को सुधारना है। सरकार का लक्ष्य न केवल बैंकों की संख्या घटाना है, बल्कि एक मजबूत इकाई बनाकर वित्तीय क्षेत्र को मजबूत करना और बैंकिंग संचालन को अधिक प्रभावी बनाना है। इसी क्रम में छह और छोटे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय की तैयारियां की जा रही हैं।

कौन-कौन से बैंक विलय के दायरे में हैं?

अगले चरण में जिन छह बैंकों के विलय की तैयारी है, उनमें इंडियन ओवरसीज बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एंड सिंड बैंक शामिल हैं। इन बैंकों को एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, पीएनबी, कैनरा बैंक या यूनियन बैंक के साथ विलय किया जा सकता है। यह कदम इन छोटे बैंकों को मजबूत बैंकों के साथ जोड़कर उनके संचालन, बैलेंस शीट और ऋण वितरण क्षमता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।

PSU Bank Merger: सार्वजनिक बैंकों का विलय, छोटे बैंक होंगे समाप्त, क्या आपके लेन-देन पर होगा बड़ा असर?

NITI आयोग का सुझाव और संभावित विलय विवरण

पूर्व में NITI आयोग की एक रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक जैसे छोटे बैंकों का निजीकरण या पुनर्संरचना की जाए। आयोग का मानना है कि पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ बड़ौदा, कैनरा बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी बनाए रखी जाए। वहीं बाकी छोटे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक या तो विलय कर दिए जाएं, निजीकरण किया जाए या सरकार की हिस्सेदारी कम की जाए। रिपोर्ट के अनुसार इंडियन ओवरसीज बैंक को SBI या PNB में विलय किया जा सकता है। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को PNB या बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा लिया जा सकता है। बैंक ऑफ इंडिया को SBI या बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय किया जा सकता है। वहीं बैंक ऑफ महाराष्ट्र का विलय PNB या बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ संभव है।

पूर्व में हुए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विलय

इससे पहले 2017 से 2020 के बीच 10 छोटे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय चार बड़े बैंकों में किया गया था। इसके परिणामस्वरूप 2017 में 27 बैंकों से घटकर देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 12 हो गई। इसमें स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर और जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर और भारतीय महिला बैंक का विलय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में किया गया। ओरीयंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का विलय पंजाब नेशनल बैंक में हुआ। देना बैंक और विजया बैंक का विलय बैंक ऑफ बड़ौदा में किया गया। सिंडिकेट बैंक का विलय कैनरा बैंक में हुआ। आंध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक का विलय यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में किया गया, जबकि इलाहाबाद बैंक का विलय इंडियन बैंक में हुआ। यह कदम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अधिक प्रभावी और मजबूत बनाने के उद्देश्य से उठाया गया था।

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India’s GDP Growth: IMF रिपोर्ट में बताया गया भारत का आर्थिक सीक्रेट—6.6% GDP ग्रोथ के पीछे है ये कारण

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India's GDP Growth: IMF रिपोर्ट में बताया गया भारत का आर्थिक सीक्रेट—6.6% GDP ग्रोथ के पीछे है ये कारण

India’s GDP Growth: भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। IMF की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हाल ही में लागू किए गए GST सुधारों से भारत को अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत उच्च टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर मजबूती के साथ प्रदर्शन कर रही है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर के बाद, FY 2025-26 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी है।

आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की क्षमता

IMF का मानना है कि भारत का भविष्य में विकसित अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य व्यापक संरचनात्मक सुधारों से मजबूत किया जा सकता है। ऐसे सुधार लंबी अवधि में उच्च वृद्धि की राह प्रशस्त करेंगे। IMF ने यह भी कहा कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद, घरेलू आर्थिक परिस्थितियाँ अनुकूल बनी हुई हैं, जो मजबूत आर्थिक वृद्धि का समर्थन करेंगी। इसके अलावा, यदि अमेरिकी 50 प्रतिशत टैरिफ लंबे समय तक लागू रहता है, तब भी वित्तीय वर्ष 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 6.6 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि, वित्तीय वर्ष 2026-27 में यह दर 6.2 प्रतिशत तक गिर सकती है।

GST सुधारों का सकारात्मक प्रभाव

IMF का मानना है कि GST सुधार और टैरिफ दरों में कमी से अमेरिकी टैरिफ के नकारात्मक प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी। अमेरिका ने भारत पर कई वस्तुओं और सेवाओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जिसमें रूस से आयातित ऊर्जा पर 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल है। इस तरह के सुधारों से भारतीय उद्योगों और व्यापारियों को राहत मिलेगी, जिससे निर्यात, घरेलू उत्पादन और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। GST सुधारों के माध्यम से व्यवसायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निवेश का बढ़ावा मिलेगा।

भविष्य के जोखिम और अवसर

IMF ने चेतावनी दी है कि निकट भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कुछ जोखिम बने हुए हैं। सकारात्मक पहलू के तौर पर, नए व्यापार समझौतों का कार्यान्वयन निर्यात, निजी निवेश और रोजगार में वृद्धि ला सकता है। साथ ही, संरचनात्मक सुधारों का तेज़ी से कार्यान्वयन आर्थिक वृद्धि को और मजबूती देगा। नकारात्मक पक्ष में, वैश्विक आर्थिक व्यवधानों के बढ़ने से वित्तीय परिस्थितियाँ सख्त हो सकती हैं, कच्चे माल की कीमतें बढ़ सकती हैं, और विदेशी निवेश, व्यापार तथा जीडीपी वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

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