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RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

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RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

मुद्रास्फीति के दबाव में लगातार कमी के कारण भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपनी आगामी मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती कर सकता है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है, और इसमें बदलाव का सीधा असर लोन और EMI पर पड़ता है। पिछले दो महीनों से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति सरकार के लक्ष्य सीमा (4%-6%) के निचले स्तर से भी नीचे चल रही है, जिससे ब्याज दरों में कटौती की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, देश की दूसरी तिमाही की बेहतर-than-expected 8.2% जीडीपी वृद्धि की वजह से कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार भी दरों को स्थिर रखा जा सकता है।

विशेषज्ञों की राय: कटौती पर मतभेद

देश की आर्थिक स्थिति में सुधार और तेज रिकवरी ने विशेषज्ञों को दो हिस्सों में बांट दिया है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक गतिविधियों में मजबूती, राजकोषीय सुधार, पब्लिक निवेश में वृद्धि और जीएसटी दरों में कटौती जैसे कदमों ने अर्थव्यवस्था को अच्छा सहारा दिया है। इसलिए, आरबीआई इस समय दरों को स्थिर रख सकता है। वहीं, दूसरी ओर कई विशेषज्ञों का मानना है कि कम होती मुद्रास्फीति और महंगाई का दबाव घटने के कारण 0.25% की दर कटौती बिलकुल संभव है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 3 से 5 दिसंबर 2025 तक निर्धारित है, और निर्णय की घोषणा गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 दिसंबर को करेंगे। पिछले साल फरवरी से अगस्त तक आरबीआई कुल 1% की कटौती कर चुका है, जिसके बाद दरें 5.5% पर स्थिर हैं।

RBI की अगली मीटिंग सस्पेंस से भरी—Rate Cut मिलेगा या GDP ग्रोथ रोक बनाएगी?

HDFC और SBI रिपोर्टों में नई संकेतक

एचडीएफसी बैंक की नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में वृद्धि के अनुमान से अधिक जीडीपी प्रदर्शन और अपेक्षा से कम मुद्रास्फीति ने स्थिति को रोचक बना दिया है। रिपोर्ट में लिखा है कि यदि तीसरी तिमाही तक मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत से नीचे रहती है और दूसरी छमाही में वृद्धि पर जोखिम बढ़ते हैं, तो आरबीआई 0.25 प्रतिशत की कटौती कर सकता है। वहीं, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के आर्थिक अनुसंधान विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत जीडीपी वृद्धि और न्यूनतम मुद्रास्फीति के बीच आरबीआई को बाजारों को यह संकेत देना होगा कि आगे ब्याज दरों की दिशा क्या रहने वाली है। इन रिपोर्टों ने दर कटौती की उम्मीदों को और मजबूत किया है।

आर्थिक स्थिरता और ब्याज दरों पर आगे की राह

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि इस बार का निर्णय बेहद “कड़े मुकाबले” वाला हो सकता है, क्योंकि मौद्रिक नीति भविष्य की दिशा पर आधारित होती है। फिलहाल, वे मानते हैं कि मौजूदा रेपो रेट अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त स्तर पर है। यदि दरें घटती हैं, तो इसका फायदा गृह ऋण, कार लोन और अन्य कर्ज वाले उपभोक्ताओं को मिलेगा, जिससे बाजार में मांग बढ़ सकती है। वहीं, यदि आरबीआई दरें स्थिर रखता है, तो यह संकेत हो सकता है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक वृद्धि को लेकर आत्मविश्वास में है। अब नजरें बैठक पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि आने वाले महीनों में महंगाई, लोन और निवेश की दिशा क्या होगी।

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Foreign investors selling: हर कारोबारी घंटे करोड़ों की बिकवाली, विदेशी निवेशकों ने बढ़ाया बाजार का सस्पेंस

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Foreign investors selling: हर कारोबारी घंटे करोड़ों की बिकवाली, विदेशी निवेशकों ने बढ़ाया बाजार का सस्पेंस

Foreign investors selling: भारतीय शेयर बाजार इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) जिस रफ्तार से भारतीय शेयर बेच रहे हैं, वैसा नजारा पहले कभी नहीं देखा गया। साल 2025 में अब तक विदेशी निवेशकों ने हर कारोबारी घंटे में औसतन 152 करोड़ रुपये की इक्विटी बेच दी है। कुल मिलाकर, उन्होंने सेकेंडरी मार्केट के जरिए 2.23 लाख करोड़ रुपये से अधिक के शेयरों से अपना पैसा निकाला है। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि बाजार के लिए एक बड़ा संकेत भी देता है। इसके बावजूद राहत की बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार पूरी तरह चरमराया नहीं है और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह घरेलू निवेशकों की मजबूत भागीदारी मानी जा रही है।

‘तुमने बेचा और हमने खरीदा’ की तर्ज पर घरेलू निवेशकों की एंट्री

ट्रेडिंग कैलेंडर के अनुसार देखा जाए तो विदेशी निवेशक हर कारोबारी दिन करीब 900 करोड़ रुपये के शेयर बेच रहे हैं। बाजार खुलने के हर घंटे में यह आंकड़ा लगभग 152 करोड़ रुपये बैठता है। दिसंबर महीने में भी यही ट्रेंड जारी रहा और अब तक के सभी कारोबारी दिनों में FIIs ने लगातार बिकवाली की। दिसंबर में विदेशी निवेशकों ने लगभग 15,959 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। ऐसे समय में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने मोर्चा संभालते हुए करीब 39,965 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इससे साफ है कि फिलहाल बाजार की कमान विदेशी निवेशकों के बजाय घरेलू निवेशकों के हाथों में है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर घरेलू निवेशक आगे नहीं आते, तो बाजार पर बिकवाली का दबाव कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता था।

SIP बना बाजार की मजबूती की सबसे बड़ी वजह

बाजार को इस कठिन दौर में संभालने में SIP (Systematic Investment Plan) की भूमिका सबसे अहम साबित हुई है। बीते तीन महीनों से म्यूचुअल फंड SIP में लगातार मजबूत निवेश देखने को मिला है। इस दौरान SIP के जरिए कुल 29,445 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है। यह दर्शाता है कि आम निवेशकों का भरोसा अब भी भारतीय शेयर बाजार पर कायम है। SIP निवेश का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बाजार को लॉन्ग टर्म स्टेबिलिटी देता है और अचानक होने वाली तेज गिरावट को रोकने में मदद करता है। जहां एक तरफ FIIs लगातार पैसा निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ SIP के जरिए घरेलू निवेशक नियमित रूप से बाजार में पैसा डाल रहे हैं, जिससे बैलेंस बना हुआ है।

आगे क्या रहेगा बाजार का रुख? एक्सपर्ट्स की राय

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे कई वजहें हैं, जैसे ग्लोबल ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती और विकसित देशों के बाजारों में बेहतर रिटर्न की उम्मीद। हालांकि, भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति, GDP ग्रोथ और कॉरपोरेट अर्निंग्स को देखते हुए घरेलू निवेशक अभी भी आशावादी बने हुए हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक SIP और घरेलू संस्थागत निवेशकों का सपोर्ट बना रहेगा, तब तक बाजार बड़ी गिरावट से बचा रहेगा। यह दौर उन निवेशकों के लिए सबक भी है जो केवल विदेशी निवेशकों की गतिविधियों को देखकर घबरा जाते हैं। लंबी अवधि के नजरिए से देखें तो भारतीय बाजार की बुनियाद मजबूत है और घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी आने वाले समय में बाजार को और स्थिर बना सकती है।

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FDI in Insurance: सरकार का बड़ा कदम! इंश्योरेंस में FDI सीमा बढ़ी 74% से 100%—क्या अब मिलेगा सस्ता और बेहतर कवर?

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FDI in Insurance: सरकार का बड़ा कदम! इंश्योरेंस में FDI सीमा बढ़ी 74% से 100%—क्या अब मिलेगा सस्ता और बेहतर कवर?

FDI in Insurance: केंद्र सरकार ने बीमा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की सीमा 74% से बढ़ाकर 100% करने वाला बिल मंज़ूर किया है। यह बिल आगामी सर्दियों के सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस कदम से बीमा क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, नए खिलाड़ी आकर्षित होंगे और उपभोक्ताओं को बेहतर और सस्ती सेवाएं उपलब्ध होंगी। इस फैसले से बीमा उद्योग में तेजी से विकास होने की संभावना है और यह नीति आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र में नए अवसर पैदा करेगी।

बीमा क्षेत्र में प्रमुख सुधार

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2025–26 के बजट में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को पूरी तरह से खोलने की योजना का प्रस्ताव रखा था। इसके तहत इंश्योरेंस एक्ट, 1938 में संशोधन किया जाएगा। अब तक बीमा क्षेत्र ने लगभग ₹82,000 करोड़ का विदेशी निवेश आकर्षित किया है, और नई नीति से यह आंकड़ा काफी बढ़ने की उम्मीद है। बिल में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं, जैसे न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता को कम करना, संयुक्त बीमा लाइसेंस की स्थापना और LIC एक्ट में संशोधन। इन सुधारों से LIC बोर्ड को शाखाओं का विस्तार और मानव संसाधन प्रबंधन में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी।

बीमा बाजार में प्रतिस्पर्धा और रोजगार में वृद्धि

सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक हर नागरिक तक बीमा पहुंच सके, और यह सुधार इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस बदलाव से बीमा बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा और ग्राहकों को अधिक विकल्प मिलेंगे। साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, वित्तीय सेवाओं में पारदर्शिता आएगी और नीति धारकों के हितों की सुरक्षा मजबूत होगी। नए खिलाड़ियों के प्रवेश से बाजार में नवाचार और बेहतर ग्राहक अनुभव की संभावना बढ़ जाएगी।

नीति धारकों और अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ

संशोधित बीमा बिल मुख्य रूप से नीति धारकों के हितों को मजबूत करने, उनकी वित्तीय सुरक्षा बढ़ाने और अधिक कंपनियों के प्रवेश को सुगम बनाने पर केंद्रित है। इस कदम से बीमा उद्योग की दक्षता बढ़ेगी, व्यवसाय करने में आसानी होगी और बीमा कवरेज का दायरा बढ़ेगा। इसके अलावा, यह आर्थिक विकास को गति देगा और रोजगार सृजन में मदद करेगा। उपभोक्ताओं के लिए यह नीति सस्ती और बेहतर बीमा सेवाओं की संभावना भी बढ़ाएगी, जिससे देश में बीमा क्षेत्र की पहुंच और प्रभावशीलता दोनों में सुधार होगा।

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Mutual funds में बड़ा उछाल! 2035 तक AUM और डायरेक्ट इक्विटी दोनों में तेजी, निवेशकों के लिए बड़ा मौका

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Mutual funds में बड़ा उछाल! 2035 तक AUM और डायरेक्ट इक्विटी दोनों में तेजी, निवेशकों के लिए बड़ा मौका

Mutual funds उद्योग की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 2035 तक ₹300 लाख करोड़ के पार जाने की संभावना है, जबकि डायरेक्ट इक्विटी शेयरहोल्डिंग ₹250 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यह जानकारी Bain & Company और ऑनलाइन स्टॉकब्रोकिंग कंपनी Groww की संयुक्त रिपोर्ट ‘How India Invests’ में दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, म्यूचुअल फंड AUM में यह तेज़ वृद्धि रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के व्यापक उपयोग से प्रेरित होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले दशक में भारतीय परिवारों में म्यूचुअल फंड्स की पहुंच दोगुनी होकर 10 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो जाएगी।

Mutual funds बन रहे सबसे तेजी से बढ़ते एसेट क्लास

रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया है कि म्यूचुअल फंड उद्योग की अगली वृद्धि की लहर घरेलू अपनाने, मजबूत डिजिटल क्षमताओं, सहायक नियामक ढांचे और बढ़ते निवेशक विश्वास से संचालित होगी। वहीं, डायरेक्ट इक्विटी में बढ़ोतरी का कारण है दीर्घकालिक निवेश की ओर बदलाव और डिजिटल माध्यमों से निवेशकों की बढ़ती पहुँच। Bain India के फाइनेंशियल सर्विसेज़ के पार्टनर और हेड सौरभ तृहन ने कहा, “भारतीय परिवार धीरे-धीरे पारंपरिक बचत के नजरिए से निवेश-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहे हैं। हाल के वर्षों में म्यूचुअल फंड्स और डायरेक्ट इक्विटीज सबसे तेजी से बढ़ते एसेट क्लास के रूप में उभरे हैं।”

Mutual funds में बड़ा उछाल! 2035 तक AUM और डायरेक्ट इक्विटी दोनों में तेजी, निवेशकों के लिए बड़ा मौका

रिटेल निवेशक भारत की अर्थव्यवस्था में निभाएंगे अहम भूमिका

Groww के को-फाउंडर और COO हर्ष जैन ने भी इस दृष्टिकोण की पुष्टि की और कहा, “हम भारतीयों में एक संरचनात्मक बदलाव देख रहे हैं। अब लोग ‘पहले निवेश करें’ की मानसिकता अपना रहे हैं, न कि केवल ‘पहले बचत करें’ की।” रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि रिटेल निवेश भारत को $10 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने की यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। इससे न केवल नई नौकरियों का सृजन होगा, बल्कि वित्तीय क्षेत्र में व्यवसायों के लिए ग्रोथ कैपिटल की सुविधा भी उपलब्ध होगी।

निवेश के बढ़ते अवसर और आर्थिक असर

रिपोर्ट के अनुसार, म्यूचुअल फंड्स और डायरेक्ट इक्विटी में बढ़ती निवेश प्रवृत्ति से भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर फायदा होगा। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में इन निवेशों से 700,000 से अधिक नई नौकरियों का सृजन होगा और व्यवसायों के लिए पूंजी उपलब्ध कराई जाएगी। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और निवेशकों की जागरूकता ने पारंपरिक बचत से निवेश की दिशा में बदलाव को तेजी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति आने वाले दशकों में भारतीय वित्तीय परिदृश्य को नया आकार देगी और घरेलू निवेशकों के लिए व्यापक अवसर पैदा करेगी।

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