अकाली दल को अपने पंथक वोट की चिंता पंथक वोट बंटा तो सत्ता में लौटने का सुखबीर बादल का सपना होगा चकनाचूर

Punjab Politics : पंजाब में विधानसभा चुनाव में अब 6 महीने से भी कम का समय बचा है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंथक राजनीति के कई केंद्र उभर रहे हैं। इसमें सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले अमृतपाल सिंह की पार्टी वारिस पंजाब दे की सक्रियता ने अकाली दल की चुनौती बढ़ा दी है। अमृतपाल की पार्टी की सक्रियता से शिरोमणि अकाली दल को अपना पंथक वोट खिसकने का डर है।
पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल पंथक वोट बैंक की राजनीति के सहारे आगे बढ़ता रहा है। अब तक इस कोर वोट बैंक पर बादल परिवार मजबूत स्थिति में रहा है, अब उसे कई गुटों और नए राजनीतिक संगठनों की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अमृतपाल सिंह की ‘वारिस पंजाब दे’, सिमरनजीत सिंह मान की पार्टी और अकाली दल से अलग हुए गुट अपने-अपने तरीके से पंथक मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच सुखबीर सिंह बादल के हालिया बयानों ने भी साफ संकेत दिया है कि अकाली दल अब अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को लेकर पहले से ज्यादा सक्रिय है। दूसरी ओर बीजेपी और अकाली के संभावित रिश्तों को लेकर भी पंजाब की सियासत में चर्चाएं तेज हैं।
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल सत्ताधारी आम आदमी पार्टी या कांग्रेस पर हमला करने की बजाय लोकसभा सांसद अमृतपाल सिंह और उसकी पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ को निशाना बना रहे हैं। यह पार्टी पंजाब की राजनीति में उसी पंथिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जिस पर लंबे समय से अकाली दल का दबदबा रहा है। बादल ने आरोप लगाया कि ‘वारिस पंजाब दे’ उन्हीं ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने 1980 के दशक में पंजाब की शांति को नष्ट किया था। बादल के इन बयानों से साफ है कि उन्हें डर है कि लंबे समय से उनके साथ पंथक वोट बंट सकता है।
कमजोर हुआ अकाली दल
कई दशकों तक मुख्यधारा की पंथिक राजनीति में अकाली दल का प्रभाव काफी मजबूत रहा। हालांकि समय के साथ पार्टी की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई। खासकर 2012 से 2017 के बीच धार्मिक बेअदबी की घटनाओं को लेकर पार्टी सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा। इसी दौर में अपराध और नशे की समस्या को लेकर भी सरकार पर सवाल उठे। सुखबीर बादल की राजनीतिक छवि को भी उनके निजी कारोबारी हितों और सरकार के कामकाज के बीच कथित संबंधों को लेकर विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ा।
1996 के बाद बदली अकाली दल की राजनीति?
अकाली दल की पंथिक राजनीति से दूरी की प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो गई थी। 1996 के मोगा सम्मेलन के बाद पार्टी ने अपनी राजनीति का दायरा व्यापक करने की कोशिश की और धीरे-धीरे उसका पारंपरिक पंथिक आधार कमजोर होता गया। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल को केवल तीन सीटें मिलीं जो पार्टी के इतिहास में उसका सबसे कमजोर प्रदर्शन रहा। अकाली दल के कमजोर होने के बाद पंथिक मतदाताओं का एक हिस्सा ऐसे समूहों के साथ गया जो सीधे चुनावी राजनीति में नहीं थे।
क्या पंथिक वोट बंटेंगे?
पंजाब में पंथिक राजनीति के कई केंद्र बनने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि पंथिक वोट भी कई हिस्सों में बंट जाएंगे। पंजाब के पंथिक मतदाताओं ने कई मौकों पर अलग-अलग संगठनों के मौजूद होने के बावजूद चुनाव के समय एकजुट होकर मतदान किया है। 2022 में इस वोट बैंक के एक हिस्से ने AAP का समर्थन किया था, लेकिन अब इसका कुछ हिस्सा ‘वारिस पंजाब दे’ की तरफ जा सकता है। इसी क्रम में ‘वारिस पंजाब दे’ का नेतृत्व युवा चेहरों के हाथ में है और संगठन की पहचान टकराव वाली राजनीतिक शैली से बनी है। अमृतपाल सिंह के अलावा फरीदकोट के सांसद सरबजीत सिंह खालसा भी इसके प्रमुख चेहरों में हैं। सरबजीत सिंह खालसा ने 2024 का लोकसभा चुनाव फरीदकोट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीता था और AAP उम्मीदवार को हराया था। वह बेअंत सिंह के बेटे हैं, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले अंगरक्षकों में शामिल थे।
अकाली-बीजेपी रिश्तों पर भी नजर
पंजाब की राजनीति में पंथिक समीकरणों के साथ अकाली दल और बीजेपी के संभावित रिश्ते भी चर्चा में हैं। दोनों दलों का गठबंधन 1996 से 2020 तक चला। किसान आंदोलन और तीन कृषि कानूनों के विवाद के दौरान दोनों के रिश्तों में दूरी आई। अकाली-बीजेपी गठबंधन ने 1997, 2007 और 2012 में पंजाब में सरकार बनाई थी। 7 अगस्त को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद दोनों दलों के बीच संभावित राजनीतिक समझौते को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। हालांकि बीजेपी का राज्य नेतृत्व सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह चुका है। दूसरी तरफ दोनों दलों के बीच संभावित बातचीत की चर्चा होती रही है।
