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India Free Trade Agreements: भारत और दुनिया के कई देशों के बीच FTA बातचीत में, व्यापार बाधाओं को कम करने का बड़ा कदम

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India Free Trade Agreements: भारत और दुनिया के कई देशों के बीच FTA बातचीत में, व्यापार बाधाओं को कम करने का बड़ा कदम

India Free Trade Agreements: केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को बताया कि भारत इस समय कई देशों के साथ सक्रिय रूप से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर वार्ता कर रहा है। इनमें अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU), न्यूजीलैंड, ओमान, पेरू और चिली प्रमुख हैं। इसके अलावा कई अन्य देशों ने भी भारत के साथ औपचारिक वार्ता शुरू करने की इच्छा जताई है। सीआईआई पार्टनरशिप समिट 2025 को संबोधित करते हुए मंत्री गोयल ने कहा कि वैश्विक स्तर पर व्यापार बाधाओं को कम करना वस्तुओं, सेवाओं और पूंजी के मुक्त प्रवाह को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत पहले ही UAE, ऑस्ट्रेलिया और चार राष्ट्रों के यूरोपीय EFTA समूह के साथ FTA लागू कर चुका है।

आंध्र प्रदेश में बनेगा ‘भारत मंडपम’ जैसा सम्मेलन केंद्र

मंत्री गोयल ने यह भी घोषणा की कि भारत ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (ITPO) आंध्र प्रदेश सरकार के साथ मिलकर आंध्र मंडपम को नई दिल्ली के भारत मंडपम जैसा विश्वस्तरीय सम्मेलन केंद्र विकसित करने के लिए तैयार है। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि राज्य सरकार इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराएगी। यह केंद्र राज्य में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, व्यापार मेलों और निवेश मंचों को बढ़ावा देगा और आंध्र प्रदेश को वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए आकर्षक बनाएगा।

बिजनेस करने में आसानी के लिए महत्वपूर्ण सुधार

गोयल ने कहा कि केंद्रीय सरकार ने अब तक 42,000 से अधिक अनावश्यक अनुपालनों को समाप्त किया है और 1,500 पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को पूरी तरह से हटाया है, जिससे व्यापार करने में आसानी हुई है। मंत्री ने कहा कि इन कदमों से भारत वैश्विक व्यापार भागीदारियों और निवेश के लिए और अधिक आकर्षक बन गया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जैसे दो-तरफा निवेश को बढ़ावा देना, व्यापार बाधाओं को कम करना, पारदर्शी और खुला व्यापार माहौल बनाना, वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करना, तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहित करना और दीर्घकालिक साझेदारी के लिए स्थिर और पूर्वानुमानित नीति ढांचा तैयार करना।

खुले और सहयोगी वैश्विक व्यापार का महत्व

गोयल ने कहा कि जब दुनिया भर में संरक्षणवादी नीतियां बढ़ रही हैं, ऐसे में आपसी सहयोग और खुला व्यापार ढांचा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि व्यापार बाधाओं को कम करना और मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना न केवल भारतीय उद्योग और निवेशकों के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और आर्थिक विकास के लिए भी आवश्यक है। उनके अनुसार, भारत का लक्ष्य है कि वैश्विक व्यापार के लिए एक स्थिर, सहयोगी और आकर्षक वातावरण तैयार किया जाए, जिससे निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ें।

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Budget 2026 में क्रिप्टोकरेंसी पर बड़ा बदलाव या पुराने नियमों का ही सफर जारी

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Budget 2026 में क्रिप्टोकरेंसी पर बड़ा बदलाव या पुराने नियमों का ही सफर जारी

Budget 2026: हाल के वर्षों में भारत में क्रिप्टोकरेंसी और अन्य वर्चुअल डिजिटल असेट्स (VDAs) में निवेशकों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। हालांकि इस क्षेत्र में निवेश करना आसान नहीं है क्योंकि यहां भारी टैक्स बोझ निवेशकों को परेशान करता है। वर्तमान में लागू कर प्रणाली ने कई निवेशकों को उलझन में डाल दिया है और वे सही दिशा नहीं पकड़ पा रहे। अब जब बजट 2026 पेश होने में मात्र एक दिन बचा है, तो क्रिप्टो उद्योग से जुड़े लोगों, टैक्स विशेषज्ञों और निवेशकों की उम्मीदें फिर से बढ़ गई हैं। सभी की निगाहें सरकार की ओर टिकी हैं कि क्या इस बार टैक्स और नियमों में कोई बड़ा बदलाव होगा या फिर पुरानी प्रणाली जारी रहेगी। आइए जानते हैं क्रिप्टो निवेशकों की बजट से क्या-क्या अपेक्षाएं हैं।

निवेशकों की बजट 2026 से मुख्य अपेक्षाएं

वर्तमान में वर्चुअल डिजिटल असेट्स से होने वाली कमाई पर 30 प्रतिशत की फ्लैट टैक्स दर लगती है, जिसमें केवल संपत्ति की खरीद लागत को ही कटौती के रूप में माना जाता है। इसके अलावा हर लेन-देन पर 1 प्रतिशत टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स) काटा जाता है, जिससे सरकार को निवेश गतिविधियों का पूरा रिकॉर्ड मिलता है। हालांकि ये सख्त नियम निवेशकों के लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो रहे हैं। लगातार टीडीएस कटौती से व्यापार के लिए उपयोग होने वाली रकम लॉक हो जाती है, जिससे छोटे निवेशकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण कई निवेशक विदेशी एक्सचेंज या गैर-आधिकारिक प्लेटफॉर्म की ओर रुख कर रहे हैं जहां नियम अपेक्षाकृत आसान हैं। इस स्थिति का सीधा असर देश के घरेलू क्रिप्टो बाजार पर भी पड़ रहा है। ऐसे में निवेशक अब टैक्स प्रणाली में बदलाव और राहत की उम्मीद लगाए हुए हैं।

बजट 2022 ने बदला था क्रिप्टो टैक्सेशन का रुख

भारत सरकार ने डिजिटल संपत्तियों की ओर कुछ वर्षों पहले ध्यान देना शुरू किया था। डिजिटल ट्रांजेक्शन्स में तेजी से वृद्धि को इसके पीछे मुख्य कारण माना गया। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने बजट 2022 में स्पष्ट किया था कि क्रिप्टो और अन्य डिजिटल असेट्स के व्यापार और दायरे में इतनी वृद्धि हुई है कि इनके लिए एक अलग टैक्स सिस्टम बनाना जरूरी हो गया है। इस घोषणा से यह साफ हो गया कि सरकार अब इन संपत्तियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा मानती है और इन्हें टैक्स नेट में लाना चाहती है।

आगे क्या हो सकता है बजट में?

बजट 2026 के संदर्भ में क्रिप्टो उद्योग, निवेशकों और टैक्स विशेषज्ञों की उम्मीदें हैं कि सरकार टीडीएस की दर कम करे या इसे फिलहाल के मुकाबले और भी निवेशकों के अनुकूल बनाए। साथ ही टैक्स की दरों में कुछ राहत मिले ताकि छोटे निवेशक इस बाजार में और सहजता से आ सकें। इसके अलावा, कुछ लोग यह भी चाहते हैं कि क्रिप्टो को पूरी तरह से पारदर्शी और नियमबद्ध करने के लिए एक व्यापक कानून बनाया जाए, जिससे निवेशकों को सुरक्षा और स्पष्टता मिले। अगर सरकार इन पहलुओं पर सकारात्मक कदम उठाती है, तो यह घरेलू क्रिप्टो बाजार को मजबूत करने में मदद करेगा और भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के करीब ले जाएगा।

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Share Market Crash: शेयर मार्केट में भारी गिरावट, विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव

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Share Market Crash: शेयर मार्केट में भारी गिरावट, विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव

Share Market Crash: बजट से पहले कारोबार के आखिरी दिन गुरुवार को शेयर बाजार का माहौल बेहद नकारात्मक रहा। लगातार तीन सत्रों तक बढ़त के बाद गुरुवार को बाजार गिरावट के साथ खुला। सुबह 9:30 बजे BSE सेंसेक्स करीब 619 अंकों की भारी गिरावट के साथ 81,947 के स्तर पर था, जबकि निफ्टी 171 अंकों की कमजोरी के साथ 25,248 के पास कारोबार कर रहा था। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक सर्वे प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत विकास का अनुमान लगाया गया। बावजूद इसके बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली जो निवेशकों की चिंता को बढ़ा रही है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव

शेयर बाजार में आई गिरावट की प्रमुख वजह विदेशी निवेशकों द्वारा शेयरों की भारी बिक्री है। जनवरी महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अब तक 43,686 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बाजार से निकाले हैं। यह आउटफ्लो पिछले साल 2025 के रिकॉर्ड 19 बिलियन डॉलर से भी अधिक है। अकेले 29 जनवरी को ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 394 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिससे बाजार में दबाव और बढ़ गया। हालांकि घरेलू निवेशकों ने 2,638 करोड़ रुपये के शेयर खरीदकर बाजार को कुछ हद तक संभालने की कोशिश की है, लेकिन विदेशी बिकवाली का असर साफ तौर पर देखने को मिल रहा है।

रुपये में गिरावट से बढ़ा अनिश्चितता का माहौल

डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी भी बाजार पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। गुरुवार को रुपया 91.9850 के लगभग अपने अब तक के निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि शुक्रवार को यह 91.9125 के स्तर पर खुला। इस महीने रुपये में करीब 2.3 की गिरावट आई है, जो सितंबर 2022 के बाद की सबसे खराब प्रदर्शन वाली अवधि के करीब है। कमजोर रुपये से कंपनियों की इनपुट लागत बढ़ने का खतरा रहता है, जो खासकर उन सेक्टर्स के लिए चुनौती बन सकता है जो कच्चे माल या इंपोर्ट पर निर्भर हैं। निवेशक इस स्थिति को लेकर सतर्क हो गए हैं क्योंकि इससे कंपनियों के मुनाफे और बाजार पर दबाव बढ़ने की संभावना बनी रहती है।

सेक्टोरल इंडेक्स में भी भारी कमजोरी

बाजार में आई गिरावट केवल प्रमुख इंडेक्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि सेक्टोरल इंडेक्स भी गिरावट की मार झेल रहे हैं। शुरुआती कारोबार में निफ्टी इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंडेक्स 1 फीसदी से अधिक गिरा, जिसमें इसके सभी शेयर नीचे नजर आए। मेटल इंडेक्स में तो लगभग 4 फीसदी की गिरावट हुई, जिससे हिंडाल्को और टाटा स्टील जैसे बड़े शेयर प्रभावित हुए। इसके अलावा फाइनेंशियल, ऑयल एंड गैस और कैपिटल गुड्स सेक्टर भी दबाव में रहे। क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बाजार की अस्थिरता को और बढ़ा रही हैं। जियोजित के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वी के विजयकुमार के अनुसार बजट के नजदीक आने के साथ बाजार को वैश्विक स्तर पर कई हेडविंड्स और टेलविंड्स का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि जियोपॉलिटिकल तनाव और बढ़ती क्रूड कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा कर रही हैं, जो निवेशकों की धारणा पर असर डाल रही हैं।

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Budget 2026 में रियल एस्टेट को उद्योग का दर्जा मिलने की बड़ी उम्मीदें

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Budget 2026 में रियल एस्टेट को उद्योग का दर्जा मिलने की बड़ी उम्मीदें

Budget 2026 को लेकर रियल एस्टेट सेक्टर की नजरें सरकार पर टिकी हुई हैं। इस बार का बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा, जिसमें रियल स्टेट इंडस्ट्री के लिए कई अहम फैसलों की उम्मीद है। बिल्डर्स और डेवलपर्स चाहते हैं कि सरकार उन्हें औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा दे ताकि उन्हें लंबी अवधि के कम ब्याज वाले लोन और बेहतर फंडिंग विकल्प मिल सकें। साथ ही, वे चाहते हैं कि जमीन से जुड़े काम ऑनलाइन हों और मंजूरी मिलने की प्रक्रिया को तेज किया जाए। इसके अलावा, एक आसान सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम भी लागू हो, जिससे सरकारी मंजूरियां एक ही प्लेटफॉर्म से मिल सकें और कामकाज में तेजी आए। ये सभी मांगें इस सेक्टर की स्थिरता और मजबूती के लिए अहम मानी जा रही हैं।

संगठनों और बिल्डर्स का मानना

रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े विभिन्न संगठन और बिल्डर्स इस बात पर सहमत हैं कि उद्योग का दर्जा मिलने से उनकी पूंजी जुटाने की क्षमता बढ़ेगी। बिल्डर्स का कहना है कि यह मांग लंबे समय से की जा रही है और अब वे बजट से इस दिशा में पॉलिसी सपोर्ट की उम्मीद लगाए हुए हैं। इससे न सिर्फ निवेशकों को भरोसा मिलेगा, बल्कि सेक्टर की स्थिरता भी बढ़ेगी। प्रदीप अग्रवाल, जो सिग्नेचर ग्लोबल इंडिया के संस्थापक और चेयरमैन हैं, का मानना है कि इस क्षेत्र को औद्योगिक दर्जा मिलने पर फंडिंग आसान हो जाएगी और इससे देश की आर्थिक प्रगति को बल मिलेगा। वहीं, ट्राइबेका डेवलपर्स के सीईओ रजत खंडेलवाल ने भी कहा कि स्थायी नीतियों से न सिर्फ घर बनाने वालों बल्कि खरीदारों को भी लाभ मिलेगा।

रियल एस्टेट की भूमिका जीडीपी और रोजगार में

रियल एस्टेट सेक्टर का देश की आर्थिक संरचना में महत्वपूर्ण योगदान है। मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह सेक्टर देश की कुल जीडीपी में लगभग 7 प्रतिशत योगदान देता है और इससे 200 से अधिक जुड़ी हुई इंडस्ट्रीज में रोजगार मिलता है। प्रदीप अग्रवाल ने बताया कि अगर इस क्षेत्र को औद्योगिक दर्जा मिल जाता है, तो फंडिंग और पूंजी की उपलब्धता बेहतर होगी जिससे यह सेक्टर आर्थिक विकास में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा। उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि सही नीतियों और सरकारी सहयोग के चलते यह क्षेत्र 2047 तक देश की जीडीपी में 15 प्रतिशत तक योगदान कर सकता है, जो भारत के दीर्घकालिक विकास के लिए बेहद सकारात्मक होगा।

सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की अहमियत

रियल एस्टेट डेवलपर्स खासतौर पर सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की शुरुआत की उम्मीद कर रहे हैं। इस प्रणाली के तहत, विभिन्न विभागों की मंजूरियां और अनुमति एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिलेंगी। इससे प्रक्रियाओं में तेजी आएगी और प्रोजेक्ट समय पर पूरे होंगे। साथ ही, इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी, जो भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को कम करने में मददगार साबित होगी। डेवलपर्स का मानना है कि इस तरह की डिजिटल व्यवस्था से न केवल सरकारी तंत्र में सुधार होगा बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। बजट 2026 में इस पहल को शामिल करने से इस क्षेत्र को मजबूती मिलने के साथ ही निवेशकों और ग्राहकों का भरोसा भी बढ़ेगा।

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