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मुंबई निगम चुनाव में रिकॉर्ड 80 गैर-मराठी पार्षद चुने गए, राजनीति में बड़ा बदलाव
मुम्बई नगर निगम चुनावों से पहले ठाकरे भाइयों, उद्धव और राज ठाकरे ने मराठी पहचान, मराठी भाषा और मुम्बई को महाराष्ट्र से अलग करने के मुद्दों को लेकर जोरशोर से चुनाव प्रचार किया। उन्होंने इसे अपने पक्ष में मतदान को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया। बावजूद इसके, इस बार मुम्बई नगर निगम में कुल 227 सदस्यों में से रिकॉर्ड 80 गैर-मराठी बोलने वाले कॉर्पोरेटर चुने गए हैं। यह किसी भी चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। यह स्थिति मुम्बई की बदलती सामाजिक और भाषाई तस्वीर को दर्शाती है।
गैर-मराठी कॉर्पोरेटरों का पार्टी वार वितरण
पिछले चुनावों की तुलना में इस बार गैर-मराठी कॉर्पोरेटरों की संख्या बढ़ी है। 2017 में 72 गैर-मराठी चुने गए थे, जिनमें से 36 भाजपा के थे। इस बार भाजपा के 38 गैर-मराठी कॉर्पोरेटर चुने गए हैं, जो सबसे अधिक है। कांग्रेस के कुल 24 कॉर्पोरेटरों में से 18 गैर-मराठी हैं। ओवैसी की AIMIM पार्टी के सभी आठ और समाजवादी पार्टी के दोनों कॉर्पोरेटर भी गैर-मराठी हैं। उद्धव ठाकरे की शिव सेना (UBT) में कुल 65 सदस्यों में से छह गैर-मराठी हैं, जबकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) में छह में से एक गैर-मराठी है। शिवसेना के शिंदे गुट के 29 सदस्यों में तीन गैर-मराठी हैं। यह आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि मुम्बई की राजनीति में भाषाई विविधता तेजी से बढ़ रही है।
भाजपा का जवाब और मुम्बई की सामाजिक विविधता
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने कहा है कि मुम्बई एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विश्वव्यापी शहर है, जहां हर समुदाय, जाति और भाषा को प्रतिनिधित्व मिलता है। उन्होंने कहा कि मुम्बई में ऐसा कभी संभव नहीं है कि भाषा के नाम पर कोई राजनीति सफल हो सके। उन्होंने पेरोजशाह मेहता जैसे मेयर का उदाहरण दिया, जिनके पूर्वज ईरान से आए थे, यह दर्शाता है कि मुम्बई में सभी के लिए जगह है। इसीलिए, गैर-मराठी कॉर्पोरेटरों की बढ़ती संख्या शहर की सामाजिक और भाषाई विविधता को प्रतिबिंबित करती है।
फडणवीस का ठाकरे भाइयों पर हमला
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ठाकरे भाइयों के मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने के खतरों पर उठाए गए मुद्दों का जवाब देते हुए कहा कि मुंबई को महाराष्ट्र से कोई भी, यहाँ तक कि किसी के पूर्वज भी अलग नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा द्वारा जीते गए 89 में से 51 सीटें मराठी कॉर्पोरेटरों द्वारा जीती गई हैं, जो यह साबित करता है कि मराठी वोटर केवल शिवसेना (UBT) और MNS के ही क्षेत्राधिकार में नहीं हैं। यह बयान ठाकरे भाइयों की भाषा आधारित राजनीति की सीमाओं को उजागर करता है।