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FMCG Price Hike 2026: FMCG उत्पादों की कीमतों में 2026 में संभावित वृद्धि, आम जनता के लिए चेतावनी

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FMCG Price Hike 2026: FMCG उत्पादों की कीमतों में 2026 में संभावित वृद्धि, आम जनता के लिए चेतावनी

FMCG Price Hike 2026: देश में केंद्रीय सरकार द्वारा दिए गए GST राहत के फायदे धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। सितंबर 2025 में सरकार ने GST दरों में कटौती की थी, जिससे रोजमर्रा के FMCG उत्पादों की कीमतें घट गई थीं और उपभोक्ताओं को राहत मिली थी। हालांकि अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। रिपोर्टों के अनुसार कई FMCG कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतों में 5 प्रतिशत तक वृद्धि करने की योजना बना रही हैं, जिससे महंगाई के दबाव में और इजाफा हो सकता है।

कंपनियों ने कीमत बढ़ाने का फैसला क्यों लिया?

कंपनियों ने GST दरों में कटौती के बाद कीमतों को कुछ समय तक स्थिर रखा। लेकिन अब कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और रुपये की कमजोरी ने कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल दिया है। वितरकों का कहना है कि इस तिमाही से रोजमर्रा के उत्पाद जैसे डिटर्जेंट, हेयर ऑयल, चॉकलेट और नूडल्स बाजार में नई और बढ़ी कीमतों के साथ आएंगे, जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। इस बदलाव के कारण अब कंपनियों के लिए कीमत बढ़ाना जरूरी हो गया है।

FMCG Price Hike 2026: FMCG उत्पादों की कीमतों में 2026 में संभावित वृद्धि, आम जनता के लिए चेतावनी

कीमतों में वृद्धि की योजना और कंपनियों के बयान

इकॉनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, FMCG कंपनियां लागत दबाव के बीच कीमतें बढ़ाने के कदम उठा रही हैं। डाबर इंडिया के CEO मोहित मल्होत्रा ने बताया कि कंपनी वर्तमान चौथी तिमाही में लगभग 2 प्रतिशत कीमत बढ़ा रही है। डाबर जूस, हेयर ऑयल और कई अन्य FMCG उत्पाद बनाती है। उन्होंने कहा कि पहले एंटी-प्रॉफिटियरिंग नियमों के कारण कीमत बढ़ाने का कदम टाला गया था, लेकिन अब मौजूदा परिस्थितियां इसे आवश्यक बना रही हैं।

होम और पर्सनल केयर उत्पाद भी महंगे होंगे

साबुन, शैम्पू और डिटर्जेंट जैसे होम और पर्सनल केयर उत्पाद भी महंगे होने वाले हैं। इन उत्पादों के निर्माण में क्रूड ऑयल से बने कच्चे माल पर भारी निर्भरता होती है, जिससे लागत बढ़ने पर कीमतों में सीधा असर पड़ता है। हिंदुस्तान यूनिलीवर के CFO निरंजन गुप्ता ने हाल ही में संकेत दिया कि होम केयर उत्पादों की कीमतें जल्द बढ़ाई जाएंगी। कुछ उत्पाद पहले ही नए पैकेजिंग और कीमतों के साथ बाजार में आ चुके हैं, जबकि अन्य उत्पादों की कीमतों में भी शीघ्र बदलाव होगा। हिंदुस्तान यूनिलीवर सर्व एक्सेल, रिन और कई लोकप्रिय FMCG उत्पाद बनाती है।

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ITR 2026-27 फॉर्म जारी, टैक्सपेयर्स के लिए नए नियमों ने बढ़ाई सख्ती और पारदर्शिता

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ITR 2026-27 फॉर्म जारी, टैक्सपेयर्स के लिए नए नियमों ने बढ़ाई सख्ती और पारदर्शिता

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) के सभी फॉर्म नोटिफाई कर दिए हैं। इसके साथ ही वित्त वर्ष 2025-26 की आय के लिए रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है। विभाग ने हाल ही में ITR-2, ITR-3, ITR-5, ITR-6 और ITR-7 फॉर्म के साथ अपडेटेड रिटर्न के लिए ITR-U फॉर्म को भी जारी किया है। इससे पहले 30 मार्च को ITR-1 और ITR-4 फॉर्म अधिसूचित किए जा चुके थे। इन फॉर्म्स के जारी होने के बाद अब टैक्सपेयर्स अपने-अपने श्रेणी के अनुसार रिटर्न फाइल कर सकते हैं।

किसे कौन सा ITR फॉर्म भरना चाहिए

ITR फॉर्म अलग-अलग प्रकार के करदाताओं के लिए निर्धारित किए गए हैं। ITR-1 (सहज) और ITR-4 (सुगम) मुख्य रूप से छोटे और मध्यम करदाताओं के लिए हैं। सहज फॉर्म उन व्यक्तियों के लिए है जिनकी सालाना आय 50 लाख रुपये तक है और जिनकी आय वेतन, एक मकान, ब्याज या सीमित कृषि आय से आती है। वहीं, सुगम फॉर्म व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) और फर्मों (LLP को छोड़कर) के लिए है, जिनकी आय व्यवसाय या पेशे से होती है। ITR-2 उन लोगों के लिए है जिनकी आय व्यवसाय से नहीं बल्कि पूंजीगत लाभ जैसी अन्य स्रोतों से होती है, जबकि ITR-3 उन व्यक्तियों और HUF के लिए है जिनकी आय स्वयं के व्यवसाय या पेशे से आती है। इसके अलावा, ITR-5 फर्म, LLP और सहकारी समितियों के लिए, ITR-6 कंपनियों के लिए और ITR-7 ट्रस्ट और परमार्थ संस्थाओं के लिए निर्धारित किया गया है।

ITR 2026-27 फॉर्म जारी, टैक्सपेयर्स के लिए नए नियमों ने बढ़ाई सख्ती और पारदर्शिता

नई कंप्लायंस शर्तों से बढ़ेगी पारदर्शिता

हालांकि फॉर्म की संरचना पहले जैसी ही रखी गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नए फॉर्म में जानकारी देने की आवश्यकताएं पहले से अधिक विस्तृत हो गई हैं। इसका उद्देश्य टैक्स सिस्टम में पारदर्शिता और अनुपालन को मजबूत करना है। अब करदाताओं को कुछ विशेष परिस्थितियों में रिटर्न फाइल करना अनिवार्य होगा, भले ही उनकी आय टैक्सेबल लिमिट से कम हो। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति के PAN पर 25,000 रुपये से अधिक TDS कटा है, या उसके चालू खाते में 1 करोड़ रुपये से अधिक जमा हैं, या विदेश यात्रा पर 2 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किया गया है, तो रिटर्न फाइल करना आवश्यक हो सकता है। इसी तरह, 1 लाख रुपये से अधिक बिजली बिल जैसी स्थितियां भी रिपोर्टिंग के दायरे में आती हैं। ये प्रावधान पहले भी मौजूद थे, लेकिन अब इन्हें और स्पष्ट रूप से फॉर्म में शामिल किया गया है।

रिटर्न न भरने वालों और NRI पर विशेष फोकस

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य उन मामलों को कम करना है जहां योग्य होने के बावजूद लोग ITR फाइल नहीं करते। नए फॉर्म विशेष रूप से ऐसी स्थितियों को चिह्नित करने में मदद करेंगे, जिससे करदाताओं को सही जानकारी भरने में आसानी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार लोग यह मान लेते हैं कि उनकी आय टैक्स सीमा से कम है, इसलिए वे रिटर्न फाइल नहीं करते, लेकिन नई शर्तों के तहत उन्हें फिर भी रिटर्न दाखिल करना पड़ सकता है। खासकर वेतनभोगी, पेंशनभोगी और NRI वर्ग के लोगों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण है। अब ITR-2, ITR-3 और ITR-4 जैसे फॉर्म में अतिरिक्त घोषणाएं और चेकलिस्ट शामिल की गई हैं, जिससे करदाताओं को अपनी वित्तीय जानकारी अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करनी होगी।

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ईरान युद्ध के असर से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट

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ईरान युद्ध के असर से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट

मध्य-पूर्व में जारी तनाव और ईरान युद्ध के प्रभाव से भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सोमवार को कारोबार के दौरान रुपया शुरुआती बढ़त बनाए रखने में असफल रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.22 के स्तर तक गिर गया, जो इसका एक नया निचला स्तर माना जा रहा है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 93.62 प्रति डॉलर पर खुला था और कुछ समय के लिए 93.57 तक मजबूत भी हुआ, लेकिन यह बढ़त टिक नहीं सकी।

कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर की मजबूती का दबाव

रुपये की कमजोरी के पीछे कई वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और डॉलर की मजबूती प्रमुख हैं। ईरान में जारी युद्ध और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को अस्थिर कर दिया है, जिससे निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ी है। इस कारण डॉलर की मांग बढ़ी है और अन्य मुद्राओं के मुकाबले इसकी स्थिति मजबूत हुई है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन जाती है क्योंकि उसे तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

ईरान युद्ध के असर से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट

आम जनता पर पड़ने वाला असर

रुपये के कमजोर होने का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। जब डॉलर महंगा होता है, तो आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ जाती है। भारत को कच्चे तेल के लिए ज्यादा भुगतान करना होगा, जिससे पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स भी महंगे हो सकते हैं, क्योंकि इनके अधिकांश पुर्जे विदेशों से आयात किए जाते हैं।

रोजमर्रा की चीजों से लेकर विदेश यात्रा तक असर

रुपये में गिरावट का असर सिर्फ ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं पर भी पड़ता है। माल ढुलाई महंगी होने से खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा जो लोग विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं या जिनके बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं, उन्हें अब अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे। इस प्रकार रुपये की कमजोरी का असर व्यापक रूप से अर्थव्यवस्था और आम जीवन दोनों पर देखने को मिल सकता है।

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शेयर बाजार में सोमवार को उतार-चढ़ाव की आशंका. ग्लोबल संकेत और रुपये की कमजोरी से दबाव

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शेयर बाजार में सोमवार को उतार-चढ़ाव की आशंका. ग्लोबल संकेत और रुपये की कमजोरी से दबाव

भारतीय शेयर बाजार ने पिछले कारोबारी सप्ताह के आखिरी दिन शुक्रवार को गिरावट के साथ बंद होकर निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। इस दौरान BSE Sensex और NSE Nifty दोनों में करीब 1.27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। शुक्रवार को हुई भारी बिकवाली ने पिछले दो दिनों से चल रही तेजी पर ब्रेक लगा दिया। Sensex 2.25 प्रतिशत की गिरावट के साथ 73583.22 के स्तर पर बंद हुआ जबकि Nifty 2.09 प्रतिशत गिरकर 22819.60 पर आ गया। पूरे सप्ताह बाजार में उतार चढ़ाव का माहौल रहा जहां दोनों प्रमुख इंडेक्स कभी ऊपर तो कभी नीचे जाते नजर आए।

ग्लोबल संकेत और आर्थिक कारक बना रहे हैं दबाव

बाजार पर इस समय वैश्विक संकेतों का असर साफ दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। इस तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति में बाधा की आशंका बढ़ी है जिससे कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड ऊंचे स्तर पर बना हुआ है और क्रूड फ्यूचर्स में भी बढ़त दर्ज की गई है। इसके साथ ही भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है जिससे आयात महंगा हो रहा है और बाजार पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी बाजार को कमजोर कर रही है।

शेयर बाजार में सोमवार को उतार-चढ़ाव की आशंका. ग्लोबल संकेत और रुपये की कमजोरी से दबाव

FIIs की बिकवाली और DIIs का सपोर्ट

हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बाजार से भारी निकासी की है और लगभग 24596 करोड़ रुपये की बिकवाली की है। इसका कारण बढ़ते बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर का माहौल बताया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। DIIs ने लगभग 26897 करोड़ रुपये का निवेश कर बाजार को गिरावट से कुछ हद तक बचाया है। यह संतुलन दिखाता है कि जहां विदेशी निवेशक सतर्क हैं वहीं घरेलू निवेशक बाजार में भरोसा बनाए हुए हैं।

अहम सपोर्ट और रेजिस्टेंस लेवल और निवेशकों के लिए सलाह

विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी वर्तमान में 23000 के रेजिस्टेंस और 22500 के सपोर्ट के बीच ट्रेड कर रहा है। यदि 22500 के नीचे निर्णायक गिरावट आती है तो बाजार में करेक्शन लंबा खिंच सकता है। वहीं Sensex के लिए 73000 से 73100 का जोन महत्वपूर्ण सपोर्ट माना जा रहा है और इसके नीचे गिरावट होने पर और कमजोरी आ सकती है। बैंक निफ्टी भी कमजोर रुझान दिखा रहा है और 52000 के स्तर के आसपास टिका हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को इस समय सतर्क रहना चाहिए और आक्रामक ट्रेडिंग से बचना चाहिए। सेक्टर्स के लिहाज से फार्मा और कुछ एनर्जी स्टॉक्स मजबूत रह सकते हैं जबकि PSU बैंक ऑटो और रियल्टी सेक्टर दबाव में रह सकते हैं। तीन दिन के छोटे ट्रेडिंग सप्ताह और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए बाजार में वोलैटिलिटी बनी रह सकती है।

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