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असम चुनाव से पहले कांग्रेस में दलबदल की आंधी, क्या भाजपा को मिलेगा सीधा फायदा
असम की राजनीति में इस समय कांग्रेस पार्टी कई मुश्किलों से गुजर रही है। लगातार हो रही दल-बदल की घटनाओं ने पार्टी की स्थिति को कमजोर कर दिया है। साल 2016 से कांग्रेस राज्य की सत्ता से बाहर है और आगामी विधानसभा चुनावों में उसे भारतीय जनता पार्टी के मजबूत संगठन से मुकाबला करना होगा। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने पिछले वर्षों में कई विकास और कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं जिनका असर राज्य की राजनीति पर साफ दिखाई देता है। ऐसे में कांग्रेस के सामने न केवल चुनावी रणनीति बनाने की चुनौती है बल्कि संगठन को फिर से मजबूत करने की भी बड़ी जिम्मेदारी है।
कांग्रेस को कहां मिल सकता है फायदा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में बढ़ती एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर कांग्रेस के लिए एक अवसर बन सकती है। खासतौर पर अल्पसंख्यक मतदाता और बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय का समर्थन कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में जोरहाट सीट से गौरव गोगोई की बड़ी जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है। पार्टी ने इस बार उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया है। इससे कांग्रेस को उम्मीद है कि युवा नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों के सहारे वह भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकेगी।
लगातार हो रहे दलबदल से कमजोर हुआ संगठन
पिछले एक दशक में कांग्रेस को असम में कई बड़े राजनीतिक झटके लगे हैं। राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी कभी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे लेकिन बाद में भाजपा में शामिल हो गए। हाल ही में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और तीन अन्य विधायकों के भाजपा में जाने से पार्टी को नया झटका लगा है। जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी भी कांग्रेस के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है। चाय बागान के मजदूर जो कभी कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक माने जाते थे अब धीरे धीरे भाजपा की ओर झुकते नजर आ रहे हैं। इससे कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर भी असर पड़ रहा है।
सत्ता विरोधी माहौल कांग्रेस के लिए अवसर
राजनीतिक परिस्थितियों के बीच कांग्रेस के पास अभी भी वापसी का मौका है। यदि पार्टी सत्ता विरोधी लहर को सही तरीके से भुना पाती है तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस के पास यह अवसर भी है कि वह एनडीए गठबंधन के भीतर असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ सके। हालांकि लगातार हो रहा दलबदल और संगठनात्मक कमजोरी पार्टी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन की मजबूत चुनावी मशीनरी और प्रशासनिक पकड़ कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस इस राजनीतिक संघर्ष में खुद को फिर से मजबूत कर पाती है या भाजपा अपनी पकड़ और मजबूत कर लेती है।