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दिल्ली अदालत ने अरविंद केजरीवाल को शराब नीति घोटाले में पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया
दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को आम आदमी पार्टी (आप) के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल को शराब नीति मामले में दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों के खिलाफ भी आरोपपत्र को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सीबीआई के आरोपपत्र में कई खामियां थीं, जिनका कोई ठोस सबूत नहीं मिला। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आबकारी नीति में कोई व्यापक साजिश या आपराधिक इरादा नहीं था। दोषमुक्त होने के बाद केजरीवाल भावुक हो गए और उन्हें संभालते हुए मनीष सिसोदिया की आंखें भी छलक उठीं।
शराब नीति विवाद की लंबी और जटिल टाइमलाइन
शराब नीति घोटाले की जांच और कानूनी प्रक्रिया लगभग दो सालों से चली आ रही थी। अक्टूबर 2023 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने केजरीवाल को पहली बार समन जारी किया था। इसके बाद उन्होंने कई समनों को राजनीतिक रूप से प्रेरित और अवैध बताते हुए अनदेखा किया। जनवरी 2024 तक ईडी द्वारा जारी समनों की कानूनी चुनौती दी गई। मार्च 2024 में सत्र न्यायालय ने उन्हें जमानत दी, लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बीच लंबी खींचतान चली। जून 2024 में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया। इस पूरी प्रक्रिया में केजरीवाल ने अपनी कानूनी टीम के साथ कई जटिल याचिकाओं और अंतरिम जमानत के लिए अपील दायर की।
कानूनी लड़ाई और गिरफ्तारी की घटनाएं
10 मई 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी, जिससे वे लोकसभा चुनाव प्रचार में भाग ले सके। 2 जून 2024 को उन्होंने तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण किया, लेकिन 5 जून को अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत खारिज कर दी। 20 जून 2024 को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें नियमित जमानत मिली, जबकि 26 जून 2024 को सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया। इसके बाद की जमानत याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा। 13 सितंबर 2024 को उन्हें जमानत मिली और जनवरी 2026 में दिल्ली अदालत ने ईडी के दोनों मामलों में उन्हें बरी कर दिया।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की क्लीन चिट से आम आदमी पार्टी और उनके समर्थकों में खुशी का माहौल है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपपत्र में कई कमियां थीं और कोई ठोस साक्ष्य नहीं था। इससे न केवल राजनीतिक विवाद खत्म हुआ, बल्कि दिल्ली में विपक्ष और नागरिकों के बीच भी मामला अब शांत हुआ। इस फैसले के बाद राजनीति में आगामी चुनौतियों और आगामी चुनावों पर भी इसका असर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता की मिसाल के रूप में याद रखी जाएगी।