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Stock to Watch on Monday: 9 फरवरी को इन दो इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरों में होगी जबरदस्त तेजी
Stock to Watch on Monday: भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को मजबूत तेजी देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों प्रमुख बेंचमार्क इंडेक्स हरे निशान पर बंद हुए। खास बात यह रही कि इस तेजी में इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की दो बड़ी कंपनियों — Ashoka Buildcon और Simplex Infrastructures — ने बड़े प्रोजेक्ट हासिल करने की जानकारी शेयर की। इन खबरों के चलते सोमवार, 9 फरवरी को इन कंपनियों के शेयरों पर खास नजर रहेगी और बाजार में इनका रुख निवेशकों के लिए अहम साबित हो सकता है।
Simplex Infrastructures को मिला पावर सेक्टर से बड़ा ऑर्डर
Simplex Infrastructures ने 6 फरवरी को अपनी एक्सचेंज फाइलिंग के जरिए बताया कि कंपनी को पावर सेक्टर से जुड़ा नया प्रोजेक्ट मिला है जिसकी कुल लागत लगभग 91.96 करोड़ रुपये है। कंपनी ने बताया कि यह ऑर्डर उसके नियमित कारोबार का हिस्सा है और इससे उसकी ऑर्डर बुक में मजबूती आएगी। Simplex इंफ्रास्ट्रक्चर की पुरानी और जानी-मानी कंपनी है, जो सड़क, मेट्रो, पावर, पोर्ट और हाउसिंग के क्षेत्र में काम करती है। हालांकि कंपनी ने बीते कुछ सालों में कर्ज के कारण चुनौतियों का सामना किया, लेकिन अब धीरे-धीरे उसके वित्तीय हालात में सुधार आ रहा है।

Ashoka Buildcon को बिहार में मिला 474 करोड़ का पुल निर्माण प्रोजेक्ट
Ashoka Buildcon ने भी 6 फरवरी को एक्सचेंज को सूचना दी कि कंपनी ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में गंडक नदी पर 2280 मीटर लंबे HL RCC ब्रिज के निर्माण के लिए EPC मोड पर एक बड़ा प्रोजेक्ट हासिल किया है। यह प्रोजेक्ट कंपनी को अपने ज्वाइंट वेंचर पार्टनर Aakshya Infra Project Private Limited के साथ मिला है। कुल प्रोजेक्ट लागत लगभग 474.38 करोड़ रुपये है और इसे पूरा करने के लिए 30 महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई है। यह परियोजना बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड (BRPNNL) से मिली है, जो राज्य के विकास में अहम भूमिका निभाएगी।
शेयर बाजार में दोनों कंपनियों के शेयरों पर बढ़ेगा दबाव
इन दोनों बड़े ऑर्डरों की खबर के बाद उम्मीद की जा रही है कि सोमवार को Ashoka Buildcon और Simplex Infrastructures के शेयरों में अच्छी खासी हलचल देखने को मिलेगी। निवेशक इन खबरों को ध्यान में रखते हुए दोनों कंपनियों के स्टॉक्स को खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भी तेजी का माहौल बनेगा। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इन प्रोजेक्ट्स से इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और उनकी प्रॉफिटेबिलिटी में सुधार आएगा। ऐसे में निवेशकों के लिए यह कंपनियां संभावित लाभ के साथ जोखिम कम करने का विकल्प हो सकती हैं।
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मिडिल ईस्ट संकट से भारतीय शेयर बाजार में गिरावट, विप्रो और सिप्ला पर दबाव
मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। लगातार तीन दिनों से बाजार लाल निशान पर बंद हो रहे हैं। शुक्रवार को सेंसेक्स 1,470.50 अंक या 1.93 प्रतिशत गिरकर 74,563.92 अंक पर बंद हुआ, वहीं एनएसई निफ्टी 50 में 488.05 अंक या 2.06 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 23,151.10 के स्तर पर बंद हुआ। निवेशकों में चिंता बढ़ रही है और बाजार की इस अस्थिर स्थिति के बीच ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने कुछ प्रमुख कंपनियों को अपनी अंडरपरफॉर्म लिस्ट में शामिल किया है।
विप्रो: परामर्श सेवाओं में कमजोर मांग के चलते सावधानी बरतने की सलाह
ब्रोकरेज हाउस जेफरीज ने विप्रो के शेयर को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है। फर्म का मानना है कि कंपनी का शेयर मौजूदा स्तर से गिरकर करीब 180 रुपये तक जा सकता है, जो बीएसई पर पिछले बंद भाव 202.51 रुपये से लगभग 21 प्रतिशत कम है। जेफरीज के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में विप्रो की मुख्य रेवेन्यू में लगातार दूसरे साल गिरावट आ सकती है। परामर्श सेवाओं वाले सेगमेंट में मांग कमजोर बनी हुई है और इसी वजह से कंपनी का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।

सिप्ला: अमेरिका में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सप्लाई समस्या से दबाव
सिप्ला के शेयर को लेकर भी जेफरीज ने सतर्क रुख अपनाया है। फर्म का कहना है कि कंपनी की अमेरिका से होने वाली कमाई पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि तीन प्रमुख दवाओं में से दो को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा लैंरेओटाइड दवा की सप्लाई सहयोगी मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर से जुड़ी समस्या के कारण प्रभावित हो रही है। इन चुनौतियों की वजह से वित्त वर्ष 2027 में कंपनी का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स सालाना आधार पर लगभग 15 प्रतिशत घट सकता है। यही कारण है कि जेफरीज ने इस शेयर पर “अंडरपरफॉर्म” रेटिंग बरकरार रखी है।
हुंडई मोटर इंडिया: मांग मजबूत लेकिन प्रतिस्पर्धा चुनौती बनी
हुंडई मोटर इंडिया के शेयर को लेकर जेफरीज का अनुमान है कि इसमें तेजी की संभावना कम है। फर्म ने इसका टारगेट प्राइस लगभग 1,900 रुपये रखा है, जो पिछले बंद भाव के करीब है। हालांकि, जीएसटी में संभावित कटौती, बाजार में लिक्विडिटी की बेहतर स्थिति और सरकारी वेतन बढ़ोतरी जैसे कारणों से भारत में पैसेंजर व्हीकल की मांग मजबूत रह सकती है। लेकिन ऑटो सेक्टर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और नई वैश्विक चुनौतियां कंपनी के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।
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मिडिल ईस्ट संघर्ष के बीच चीन का बड़ा कदम, गैसोलीन और डीजल की विदेश शिपमेंट रोकी
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति की अनिश्चितता के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है। कई देशों में तेल और गैस की उपलब्धता को लेकर हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इसी बीच चीन ने घरेलू ईंधन संकट को रोकने के लिए मार्च महीने में रिफाइंड ऑयल के निर्यात पर अस्थायी रोक लगा दी है।
चीन का बड़ा फैसला: गैसोलीन, डीजल और एविएशन फ्यूल पर रोक
चीन की सरकारी संस्था National Development and Reform Commission (एनडीआरसी) ने आदेश जारी किया है कि मार्च महीने में गैसोलीन, डीजल और हवाई ईंधन की विदेशों में शिपमेंट रोकी जाए। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की कमी को रोकना है। बीजिंग का यह कदम ऐसे समय में आया है जब Strait of Hormuz में तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो रही है और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है।

आईईए और अमेरिका ने उठाए कदम, वैश्विक आपूर्ति स्थिर करने की कोशिश
वैश्विक ऊर्जा संकट को देखते हुए International Energy Agency (आईईए) ने भी राहत देने का कदम उठाया। एजेंसी ने कहा कि उसके सदस्य देश आपूर्ति संकट से निपटने के लिए 400 मिलियन बैरल तेल आपातकालीन भंडार से जारी करेंगे। यह 1973 के ऑयल क्राइसिस के बाद ऐसा छठा मौका है जब आईईए ने वैश्विक तेल आपूर्ति स्थिर रखने के लिए इस तरह का कदम उठाया। वहीं, अमेरिका ने अपने Strategic Petroleum Reserve से 172 मिलियन बैरल कच्चा तेल जारी करने का फैसला लिया है।
मध्य पूर्व तनाव और तेल आपूर्ति पर असर
वेस्ट एशिया में तनाव 28 मार्च को बढ़ा जब Israel ने Iran पर हवाई हमले किए। यह संघर्ष अब लगभग दो सप्ताह से जारी है और अगर युद्ध लंबा चलता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के निर्यात रोकने के फैसले और मध्य पूर्व संघर्ष के कारण आने वाले हफ्तों में वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और कीमतों में तेजी बनी रह सकती है।
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ईरान-इजरायल संघर्ष से क्रूड ऑयल कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचीं, वैश्विक चिंता
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ इन देशों तक सीमित नहीं रहा है। वैश्विक बाजारों में क्रूड ऑयल की कीमत सोमवार को 120 डॉलर प्रति बैरल के हाई लेवल पर पहुंच गई। इससे दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति में रुकावट का डर बढ़ गया है। यह स्थिति लोगों के जेहन में 2008 का दौर ताजा कर रही है, जब क्रूड ऑयल की कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची थीं। उस समय कीमतों में इतनी तेजी किसी युद्ध या जियोपॉलिटिकल लड़ाई के कारण नहीं थी।
क्या कहता है डेटा: कीमतों में तेजी का असली कारण
US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के डेटा के अनुसार तेल की कीमतें पहले से ही लगातार बढ़ रही थीं। 2003 में लगभग 30 डॉलर प्रति बैरल से यह कीमत 2008 की शुरुआत तक 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गई थी। यह तेजी वैश्विक ऊर्जा मांग में बड़े बदलाव को दर्शाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतों में आई इस रिकॉर्ड बढ़ोतरी का कारण जंग नहीं बल्कि आर्थिक और बाजार संबंधी कारक थे। इस बात को समझने के लिए हम उस समय के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को देख सकते हैं।

उभरते बाजार और उत्पादन की कमी ने बढ़ाई कीमतें
कीमतों में वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत और चीन जैसे उभरते बाजारों में तेजी से बढ़ता औद्योगिककरण था। इन देशों में ऊर्जा की खपत बढ़ने से तेल की मांग काफी बढ़ गई। इसके विपरीत वैश्विक स्तर पर उत्पादन धीमा रहा, जिससे बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच अंतर बढ़ गया। डॉलर की वैल्यू में कमी ने भी खरीदारों के लिए तेल को सस्ता बना दिया, जिससे मांग और कीमतों दोनों बढ़ गई। दूसरी करेंसी में कीमत बढ़ने से सट्टेबाजी और निवेशकों की गतिविधियों ने तेल की कीमतों को और ऊंचा किया।
फाइनेंशियल मार्केट और हेज फंड का असर
तेल की बढ़ती कीमतों में फाइनेंशियल मार्केट की भूमिका भी अहम रही। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस की स्टडी के अनुसार 2000 के दशक के बीच ऑयल फ्यूचर्स मार्केट में निवेशकों की बढ़ी हिस्सेदारी ने कीमतों में उतार-चढ़ाव को तेज किया। इसके अलावा हेज फंड और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स से कमोडिटी मार्केट में बड़े पैमाने पर कैपिटल फ्लो ने रैली को और मजबूत किया। परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती रहीं, जिससे ऊर्जा संकट और निवेशकों की चिंता बढ़ गई।
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